गला घोटू कानून 1857

गला घोटू कानून 1857

(Throat Act 1857)


Throat Act 1857

सन 18 सो 57 के विद्रोह के समय तत्कालीन समाचार पत्र जनता की भावनाओं को तथा उनकी आवाज को महत्वाकांक्षा को वह प्रतिबिंब कर रहे थे ऐसे अनेक पत्रों पर उदय इस दौर में हुआ जिन्होंने जनता की भाषा में अपनी बात कहते हुए राष्ट्रीय चरित्र ग्रहण किया इस प्रकार भाषाई प्रेस का भी तेजी से विकास होने लगा समाचारपत्र तथा पत्रिकाएं की व्यापक प्रसार एवं प्रभाव को देखते हुए लॉर्ड कैनिंग ने प्रेस को नियंत्रित करने की आवश्यकता महसूस की स्वाधीनता संग्राम के इस दौर में 13 जून 1857 को बिना पूर्व अनुमति के प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना और उनके प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया सरकार अपनी बीवी से लाइसेंस प्रदान कर सकती थी अथवा रद्द कर सकती थी यह नियम एक प्रकार से एडम 1823 की प्रेस नियंत्रण की पुनरावृति  रूप थी.

Lord canning कि यह नियम गला घोटू कानून (gagging act) के नाम से प्रसिद्ध है कि सेक्टर से सरकार को ऐसी अधिकार प्राप्त हो गई जिनके माध्यम से वह और किसी भी समाचार पत्र पुस्तक या अन्य मुद्रित  सामग्री कि प्रकाश संज्ञा प्रसार को प्रतिबंधित कर सकती थी यह एक्ट अंग्रेजी एवं भारतीय भाषा की पत्रों पर समान रूप से लागू किया गया था 1 वर्ष तक के लिए संपूर्ण भारत में लागू इस कानून में प्रकाशक तथा मुद्रक का नाम एवं प्रकाशन स्थल का पता प्रकाशित करना भी अनिवार्य कर दिया गया इस कानून को लागू करते हुए लॉर्ड कैनिंग ने कहा-

"मुझे संदेह है कि इस बात को पूरी तरह समझा जा रहा है या नहीं कि पिछले कुछ हफ्तों से भारतीय समाचार पत्र भी भारतीय जनता को जानकारी देने के नाम पर उनके हृदय में राजद्रोह का जहर घोलने का काम कर रही है यह काम बड़ी मेहनत चतुराई और कौशल से किया जा रहा है तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने के अलावा सरकार को लगातार बदनाम किया जा रहा है अपने उद्देश्य के बारे में झूठ मुठ ऊंची ऊंची दावे पीसी किए जा रही हैं और सरकार तथा उसकी प्रजा जनों के बीच असंतोष और नफरत के बीज बोए जा रही है जो टिप्पणी इस समय में भारतीय समाचार पत्रों के बारे में कर रहा हूं वह यूरोपियन समाचार पत्रों पर लागू नहीं होती है"

इस अधिनियम के तहत अनेक पत्रों पर कार्यवाही की गई देवेंद्र नाथ टैगोर की पत्र 'बंगाल हरकार' का 1 सप्ताह के लिए प्रकाशन स्थगित कर दिया गया 24 सितंबर 18 सो 57 इसकी संपादक द्वारा त्याग पत्र लेखन की कथित आरोप लगाकर अनेक संपादकों पर मुकदमे चलाएगी फ्रेंड ऑफ इंडिया को उकसाने वाले लेख के प्रकाशन के कारण चेतावनी दी गई जो अधिनियम अधिक प्रभावी बंता उससे पूर्व 13 जून 1818 को उसकी अवधि ही समाप्त हो गई बंगाल की बाहरी क्षेत्रों में उसका विशेष असर नहीं हुआ था.


स्वतंत्रता के लिए लड़ी गई इस संग्राम में हालांकि भारतीयों को सफलता तो नहीं मिली किंतु अब लोगों में राजनैतिक अधिकारों के प्रति सजगता उत्पन्न हो गई थी इस दौरान भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन भी समाप्त हो गया तथा ब्रिटिश सरकार ने अपना अधिकार स्थापित कर दिया नंबर 858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा के साथ भारत के प्रशासन में परिवर्तन हो गया तथा लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने वायसराय बनने के बाद कैनिंग ने प्रेस का समर्थन जुटाने का प्रयास किया कैनिंग ने deters room की स्थापना भी की जहां पत्रकारों तथा सार्वजनिक रूप सूची की दृष्टि के लिए प्रमुख समाचार पत्र उपलब्ध कराए जाते हैं थी सन 18 सो 60 में भारतीय दंड संहिता की अभी कहां पर विचार विमर्श के दौरान भारतीय प्रेस के लिए और अधिक उदारता प्रदर्शित की गई लॉर्ड कैनिंग ने धारा 12 13 को जो राज दिलों से संबंधित थी को हटाने का सुझाव दिया जिसे स्वीकार कर लिया गया उसकी धारणा थी कि इस का सहारा लेकर प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रहार किया जा सकता है लगभग एक दशक की बात यह धारा पुनः जोड़ी गई.


गला घोटू कानून की अवधि बीतने पर 18 सो 57 के बाद फिर समाचार पत्रों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि हुई बंपर स्टैंड टेलीग्राफ और कुरियर जो पहले मुंबई टाइम्स के रूप में निकलते थे 28 सितंबर 18 सो 61 को मिल गई और इस सम्मिलित पत्र का नाम "Times of India"हुआ सन 18 सो 65 में इलाहाबाद से पायोनियर तथा शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष प्रयासों से बंगला भाषा में साप्ताहिक पत्रिका "अमृत बाजार पत्रिका" सन 18 सो 65 में अमृत बाजार गांव से प्रारंभ हुई थी.


अंग्रेजी शासन के प्रति विद्रोह के बाद भारतीय प्रेस के शुरू में विशेष परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे जनता की भाषा में अपनी बात कहने के कारण भाषाई प्रेस ने राष्ट्र चेतना के प्रसार में अभूतपूर्व वृद्धि की यह भाषाई पत्र जन-जन की आस्था और आकांक्षाओं के प्रतीक बन गई और प्रगतिशील विचारों के प्रेरक मैंने बंगाली प्रेस तो निश्चय ही भारत के अन्य राज्यों के लिए आदेश सिद्ध हुई सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त करते हुए विचार स्वतंत्र की मांग करने वाले युगीन पत्र निर्भीक आलोचना की प्रवृत्ति के कारण सरकार के लिए सिरदर्द साबित हुए.

लॉर्ड एल्गिन का संक्षिप्त शासन सन 18 सो 62 से नवंबर सन 18 सो 63 तक विशेष उल्लेखनीय नहीं रहा सन 1869 मैं सर जॉन लॉरेंस वायसराय बने किसके शासनकाल में छापेखाने तथा समाचार पत्रों (regulation of printing press and the newspaper act.) नियंत्रित करने के संबंधित कानून पारित किया गया जो कानून अब समाचार पत्र एवं पुस्तक पंजीकरण नियम 1867 (press and book registration act of 1867) के नाम से जाना जाता है इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य प्रेस पर किसी तरह का नियंत्रण लगाना नहीं था इसका मुख्य उद्देश्य सरकार को प्रिंटिंग प्रेस की गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त करना था.


सन 1869 मैं लॉर्ड मेयो की नियुक्ति वायसराय के रूप में की गई इसकी शासन काल में भारतीय दंड संहिता में संशोधन प्रस्ताव प्रस्तावित किया गया इस संशोधन के अनुसार बोलेगी या लिखे गए शब्दों का संकेतों द्वारा भड़काने वाले प्रयासों का प्रतिबंध लगा दिया गया जिनसे भारत में भारतीय सरकार की सिद्ध और संतुष्टि उत्पन्न हो सन 18 98 में इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 124a में संभावित किया गया जो आज तक अपने संशोधित रूप में भारतीय दंड संहिता में विद्यमान है 1872 से 1876 तक lord northbok  भारत के वायसराय रहे लॉर्ड नार्थ बुक के शासनकाल में बिहार में भयंकर अकाल पड़ा कृषि विभाग के अंडर सेक्रेट्री रोबोट नाइट उसे समय एग्रीकल्चर गजट ऑफ इंडिया का संपादन भी करते थे अपने पत्र के माध्यम से नाईट के अकाल की स्थिति पर वायसराय की स्थिति की कठोर आलोचना की सरकारी अधिकारियों को समाचार पत्रों की संपर्क की समस्या एक बार पुनः बुरी ऐसी स्थिति में 1818 की आदेशों की भली भांति lord northbrook मैं आदेश जारी किया जिसके तहत सरकारी अधिकारियों पर राजनैतिक पत्रों के स्वामित्व या संपादन दायित्व से जुड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया इन परिस्थितियों में रॉबर्ट नाइट ने अपने पद से त्यागपत्र देकर जनवरी 1817 में कोलकाता में स्टेट्समैन की स्थापना की थी
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