जानिए भारतीय पत्रकारिता की एरियोपेगेटिका क्या है

भारतीय पत्रकारिता की एरियोपेगेटिका

(areopagitica of Indian press)  


areopagitica of Indian press

प्रिय पाठको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हुए इस कुठाराघात का सर्वत्र तीव्र विरोध किया गया चंद्रकुमार टैगोर, द्वारकानाथ टैगोर, राजा राममोहन राय, Hoor Chandra घोष तथा प्रसून कुमार टैगोर आदि ने इसके विरुद्ध संयुक्त रूप से याचिका दायर की, जिसे अस्वीकार कर दिया गया

 Km. Sofia collate ने प्रेस नियंत्रक के विरुद्ध दायर इस याचिका को भारतीय पत्रकारिता  (areopagitica of Indian press)  की areopagitica मैं कहां है-

"ज्ञान के प्रसार का उस मानसिक सुधार का पूर्ण अवरोध हो जाएगा जो इस समय पूर्व की परिपूर्ति भाषाओं से इस देश की लोक भाषाओं में अनुवाद अथवा विदेशी प्रकाशनों से समाहित साहित्यिक भाषा ज्ञान के प्रसार से हो रहा है.

न्याय प्रिया शासक की निगाह में उतनी ही बड़ी एक और बुराई यह है कि यहां देशवासियों को सरकार की उन गलतियों और अन्याय को तुरंत बताने से वंचित करती है 
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जो इस विस्तृत देश के विभिन्न भागों में उसके अधिकारियों द्वारा किए जा सकते हैं तथा देशवासियों का इंग्लैंड में अपने दयालु सम्राट और परिषद को निर्भीकता और सच्चाई से उसके साम्राज्य से इस सुदूरवर्ती भाग में उनकी राज भक्त प्रजा को वास्तविक स्थिति की तथा उस व्यवहार को बताने से भी वंचित करती है

 जो स्थानीय सरकार द्वारा उनके साथ किया जाता है क्योंकि जैसा अब तक होता है भविष्य में ऐसी सूचना ना तो उन अंग्रेजी अखबारों के माध्यम से इंग्लैंड ने भेजी जा सकती है जिनमें देसी प्रकाशनों के अंग्रेजी अनुवाद यहां छपते थे और उन पर अंग्रेजी प्रकाशनों के माध्यम से ही भेजी जा सकती है 

जिन्हें देशवासी स्वयं इस प्रस्तावित नियमावली और अध्यादेश से पहले स्थापित करने का विचार कर रहे हैं प्रत्येक अच्छा शासक जिसे यह विश्वास है की मानव स्वभाव अपूर्ण होता है तथा जो विश्व की एक नित्य शासक में श्रद्धा रखता है इस बात को जानता है

 कि इतने विशाल साम्राज्य के मामलों के प्रबंधन में भारी गलतियां हो सकती हैं और तो भाई जो कुछ उसके हस्तक्षेप योग्य हो उसे अपने ध्यान में लाए जाने के लिए प्रति व्यक्ति को द्रुत साधन उपलब्ध कराने के लिए उत्सुक रहता है 

इस महत्वपूर्ण उद्देश्य की सिद्धि के लिए समाचार पत्रों की अनियंत्रित स्वतंत्रता की एकमात्र ऐसा स्वभाव साधन है जिसे काम में लाया जा सकता है"

इस याचिका के शिकार हो जाने पर राजा राममोहन राय ने सब परिषद राजा से इसके खिलाफ अपील करते हुए कहा-

"यदि इस देश की विशेष परिस्थितियों से निकाले गए इस निष्कर्षों से यह तर्क उपस्थित किया जाए कि किसी उपनिवेश यार दूरदर्शी अधीन को कभी प्रेस स्वतंत्र नहीं दिया जा सकता तथा इसलिए बंगाल के निवासियों को उन विशेष अधिकारियों के प्रयोग की अनुमति नहीं दी जा सकती जिनका उपयोग में अब तक कर रहे थे 

तो दूसरी शब्दों में इसका अर्थ उनसे यह कहना होगा कि उन्हें निरंतर उत्पीड़न एवं अपमान सहन करने का एहसास आप दिया गया है जिस से मुक्त होने की वे तब तक ऐसा नहीं कर सकते जब तक कि यहां ब्रिटिश शासन मौजूद है"

यदि श्रीमान की राज भक्तों पर जाना भर के लिए यह भी सोचे कि ब्रिटिश राष्ट्र केवल स्वार्थ पूर्ण नीति से प्रेरित होकर भारत को एकमात्र बहुमूल्य संपत्ति समझता है 

तथा उस पर अधिकार जमाए रखने एवं उससे पूरा लाभ उठाने के सर्वोत्तम साधनों के अलावा और किसी चीज की परवाह नहीं करता तब भी उसे नौकरों द्वारा उसकी भली प्रकार देखभाल होनी आवश्यक है

 इसलिए शासक और शासित दोनों के लिए स्वतंत्र प्रेस की सत्ता की उतनी ही आवश्यकता है.
 याचिका की अस्वीकृति के विरोध में राजा राममोहन राय ने मेरा तु लख बार नामक पत्र के प्रकाशन को 4 अप्रैल सन 1823 को बंद कर दिया इस अंतिम संस्करण में राय ने लिखा-

"जो परिस्थिति उत्पन्न हो गई है उसमें पत्र का प्रकाशन रोक देना ही एकमात्र मार्ग रह गया है जो नियम बने हैं उनके अनुसार किसी यूरोपियन सज्जन के लिए जिसकी पहुंच सरकार के चीफ सेक्रेटरी तक सरलता से हो जाती है 

सरकार से लाइसेंस लेकर पत्र निकाल देना आसान है पर भारत के किसी निवासी के लिए जनों की सरकारी भवन देहरी लांग ने में भी समर्थ नहीं हो पाता पत्र प्रकाशन के लिए सरकारी आज्ञा प्राप्त करना दुष्कर कार्य हो गया है 

फिर खुली अदालत में हलफनामा दाखिल करना भी कम मान जनक नहीं है लाइसेंस के लिए जाने का खतरा भी सदा सिर पर झूला करता है ऐसी दशा में पत्र का प्रकाशन रोकना ही उचित है"

सर सुधा निधि के प्रथम वर्ग के छात्रों के अंक में लिखा गया कि जितने देसी भाषा के पत्र हैं सब के सब प्रेस एक्ट के चंगुल में पड़ी जमीन जीप से बोलते हैं और बहुतेरे तो लिखना भी छोड़ देते हैं

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