भारतीय प्रेस विदेश संबंध अधिनियम क्या है


भारतीय प्रेस विदेश संबंध अधिनियम क्या है

भारतीय प्रेस विदेश संबंध अधिनियम क्या है




2 April 1932 को विदेश संबंधी अधिनियम (the foreign relation act) पारित किया गया इस अधिनियम में ऐसे प्रकाशनों को दंडित करने का प्रावधान था जो ऐसी सामग्री प्रकाशित करते हो जिनसे विदेशी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ता हो किस अधिनियम के द्वारा इस प्रकार की व्यवस्था की जहां भारतीय दंड संहिता के 21 वें अध्याय के अधीन कोई अपराध भारत की सीमा के बाहर सीमावर्ती राज्य के शासक के विरुद्ध किया जाता अथवा इस प्रकार के शासन के प्रमुख मंत्री के पुत्र अथवा संगीत के विरुद्ध होता है था उस अवस्था में काउसिल स्थित गवर्नर जनरलप्रकार की अपराध की लिखित शिकायत कर सकता था अथवा किसी अन्य व्यक्ति को इस प्रकार कार्य के लिए अधिकृत कर सकता था ऐसी स्थिति में कोई भी अदालत जो इस प्रकार के अपराधों की सुनवाई कर सकने में अधिकृत हो ऐसी शिकायतों के विरुद्ध यथोचित कार्यवाही कर सकती थी कोई भी पुस्तक समाचार पत्र तथा कोई अन्य मसविदा है जिसमें इस प्रकार की अपमानजनक सामग्री हो जिसे ब्रिटिश सरकार तथा इस प्रकार के राज्य के पारंपरिक संबंधों पर प्रभाव पड़ने का डर हो उसे विद्रोह आत्मक साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता था

देसी राज्यों के प्रशासन पर ब्रिटिश भारत के समाचार पत्रों के आकार आक्रमणों को रोकने तथा भारतीय रियासतों में असंतोष फैलाने वाले समूह तथा प्रदर्शनकारियों को दंडित करने के उद्देश्य में 1934 में भारतीय राज्य अधिनियम (Indian states act) पारित एवं लागू किया गया ओके सभी कानूनों के मूल में प्रेस की स्वतंत्रता को कुंठित करने का प्रयास था ब्रिटिश सरकार ने प्रेस के बढ़ते प्रभाव को रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी किंतु इन विपरीत परिस्थितियों में भी पत्रकारों ने अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी और पूरे समर्पण प्रभाव से राष्ट्रीय जीवन धारा से जुड़ने रहकर संघर्ष करते रहे अक्टूबर 1931 से फरवरी 1935 के मध्य 527 प्रिंटिंग प्रेस तथा समाचार पत्रों को जमानत दे देनी पड़ी 124 को अतिरिक्त जमानत दे देनी पड़ी 17 की जमानत है रद्द कर दी गई तथा 256 के प्रकाशन स्थगित हो गए.

इतने पर हारो और संघर्षों के बावजूद भी भारतीय प्रेस ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों की कटु आलोचना की तथा जनता को उनके अधिकारों का बोध कराते हुए स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया दिए विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने के साथ पुनः सेंसरशिप लागू कर दी गई प्रत्येक प्रांत में मुख्य सेंसर अधिकारी सार्वजनिक सूचना के निदेशक तथा अन्य सेंसर तथा सलाहकार समितियों के कार्य करना प्रारंभ कर दिया नेशनल हेराल्ड को सन 1940 में कहा गया कि वह युद्ध समाचारों से संबंधित शिक्षकों को कैंसर के पास करके प्रकाशित करें यह पत्र आदेश को वापस लिए जाने तक बिना शिक्षकों के ही युद्ध समाचार प्रकाशित करता रहा 12 जनवरी 1943 को अनेक समाचार पत्रों ने हड़ताल भी रखी इस प्रकार कड़े संघर्ष के बाद अंततः 15 अगस्त सन 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ स्वतंत्र भारत में प्रेस जगत के विकास के खुले अवसर मिले नवनिर्माण में भी प्रेस को महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करना था.
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