दून इंटरनेशनल स्कूल की मिसाल: किताबों की खरीद पर अभिभावकों को दी 'आजादी'; प्रिंसिपल बोले- 'कहीं से भी खरीदें पुस्तकें, पुरानी किताबों का भी करें उपयोग'


Aapki Media AI


देहरादून, 04 अप्रैल 2026: नया शैक्षिक सत्र शुरू होते ही जहाँ कई निजी स्कूलों पर किसी खास दुकान से महंगी किताबें खरीदने का दबाव बनाने के आरोप लग रहे हैं, वहीं देहरादून के प्रतिष्ठित दून इंटरनेशनल स्कूल ने इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. दिनेश बर्तवाल ने एक आधिकारिक बयान जारी कर अभिभावकों को किसी भी प्रकार की बाध्यता से मुक्त रखने का निर्णय लिया है।


प्रिंसीपल ने स्पष्ट किया कि विद्यालय प्रबंधन का उद्देश्य शिक्षा को सुगम बनाना है, न कि अभिभावकों पर कोई आर्थिक बोझ डालना। स्कूल ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का भी सहारा लिया है।

दून इंटरनेशनल स्कूल: पुस्तक खरीद एवं प्रबंधन नीति (School Policy 2026)

मुख्य बिंदु (Key Points)विद्यालय प्रशासन का निर्णय (School Decision)
खरीद की स्वायत्तताअभिभावक किसी भी बुक स्टोर से किताबें खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं।
पुरानी किताबों का उपयोगछात्र अपने वरिष्ठों (Seniors) की पुरानी किताबों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
सूचना का माध्यमनोटिस बोर्ड, व्हाट्सएप और डिजिटल माध्यमों से सूची उपलब्ध।
पारदर्शितारिजल्ट (PTM) के दिन ही कक्षावार सूची सार्वजनिक कर दी गई थी।
मुख्य उद्देश्यछात्रों का भविष्य निर्माण और आर्थिक दबाव से मुक्ति।

मुनाफाखोरी के खिलाफ 'दून इंटरनेशनल' का कड़ा रुख: मुख्य बातें

  • किसी खास स्टोर की बाध्यता नहीं: डॉ. दिनेश बर्तवाल ने साफ शब्दों में कहा कि विद्यालय प्रशासन ऐसी किसी भी नीति का समर्थन नहीं करता जहाँ अभिभावकों को किसी विशेष स्टोर पर भेजा जाए। अभिभावक अपनी सुविधा और बजट के अनुसार बाजार में कहीं से भी पुस्तकें ले सकते हैं।
  • पुरानी किताबों को प्रोत्साहन: स्कूल ने एक बेहद सकारात्मक कदम उठाते हुए कहा है कि यदि किसी छात्र के पास पिछले वर्ष के छात्रों की पुस्तकें उपलब्ध हैं और पाठ्यक्रम समान है, तो वे उन पुरानी किताबों का बेझिझक उपयोग कर सकते हैं। इससे पर्यावरण और जेब दोनों को राहत मिलेगी।
  • डिजिटल पारदर्शिता: सूचना के अभाव में अभिभावक परेशान न हों, इसके लिए स्कूल ने व्हाट्सएप ग्रुप्स और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर क्लास-वाइज बुक लिस्ट साझा की है। यह कदम बिचौलियों और कमीशनखोरी की संभावनाओं को खत्म करने के लिए उठाया गया है।
  • PTM के दिन ही सूची जारी: स्कूल ने सत्र की शुरुआत से पहले ही रिजल्ट के दिन नोटिस बोर्ड पर सूची चस्पा कर दी थी, ताकि अभिभावकों के पास सही विकल्प चुनने का पर्याप्त समय हो।
  • शिक्षा का केंद्र, व्यापार का नहीं: डॉ. बर्थवाल ने जोर देकर कहा कि विद्यालय की प्राथमिक जिम्मेदारी छात्रों का सर्वांगीण विकास है। आर्थिक दबाव बनाकर शिक्षा के मंदिर की गरिमा को कम नहीं किया जाना चाहिए।

अन्य स्कूलों के लिए एक सबक

दून इंटरनेशनल स्कूल की यह नीति न केवल अभिभावकों के लिए बड़ी राहत है, बल्कि उन स्कूलों के लिए भी एक संदेश है जो किताबों के नाम पर मुनाफाखोरी को बढ़ावा देते हैं। पारदर्शिता और छात्र-हित की ऐसी मिसालें ही शिक्षा व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करती हैं।




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Krishna Kumar
लेखक के बारे में

कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 6+ साल पहले 'आपकी मीडिया' जैसे बहुआयामी संस्थान... और पढ़ें
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