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देहरादून, 04 जून, 2026: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्थित प्रतिष्ठित डीएवी (पीजी) कॉलेज में हुए बहुचर्चित और संवेदनशील छात्रवृत्ति घोटाले (Scholarship Scam) में प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate - ED) ने एक बहुत बड़ी और निर्णायक कानूनी कार्रवाई को अंजाम दिया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (Prevention of Money Laundering Act - PMLA) के तहत गठित देहरादून की विशेष अदालत में आरोपियों के खिलाफ अभियोजन शिकायत (Prosecution Complaint - जिसे सामान्य बोलचाल में चार्जशीट कहा जाता है) दाखिल कर दी है।
ईडी द्वारा विशेष पीएमएलए कोर्ट में दाखिल किए गए दस्तावेजों के अनुसार, यह पूरा घोटाला वर्ष 2009 से 2014 के बीच का है। इस दौरान समाज के सबसे वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों—अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मेधावी छात्रों के भविष्य को संवारने के लिए सरकार द्वारा निर्धारित की गई ₹2.27 करोड़ (ब्याज सहित) की छात्रवृत्ति राशि को कथित रूप से आपराधिक साजिश, दस्तावेजों में हेरफेर और धोखाधड़ी के जरिए हड़प लिया गया था। ईडी द्वारा कोर्ट में चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद अब इस मामले में नामजद आरोपियों पर स्पेशल कोर्ट की निगरानी में सख्त कानूनी शिकंजा कसना तय हो गया है।
घोटाले की पृष्ठभूमि: पुलिस FIR और चार्जशीट के आधार पर ED ने संभाली कमान
इस महा-घोटाले की शुरुआत स्थानीय स्तर पर दर्ज की गई आपराधिक शिकायतों के बाद हुई थी। देहरादून पुलिस द्वारा दर्ज की गई मूल एफआईआर (FIR) और उसके बाद स्थानीय जांच एजेंसी द्वारा कोर्ट में दाखिल की गई प्रारंभिक चार्जशीट के आधार पर ही ईडी ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मनी लॉन्ड्रिंग का क्रिमिनल केस दर्ज किया था।
ईडी की वित्तीय जांच (Financial Investigation) में यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग के गरीब छात्रों की पढ़ाई के लिए समाज कल्याण विभाग द्वारा जो भारी-भरकम धनराशि कॉलेज को भेजी जा रही थी, उसे कभी भी वास्तविक हकदार छात्रों तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। इसके बजाय, इस पवित्र सरकारी धन को कॉलेज के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों और उनके सहयोगियों द्वारा एक सुनियोजित साजिश के तहत एक अनधिकृत और गुप्त बैंक खाते (Unauthorized Bank Account) में डायवर्ट (Wander) कर दिया गया, जहाँ से इस पूरी राशि का खुलेआम गबन किया गया।
डीएवी छात्रवृत्ति घोटाले का वित्तीय लेखा-जोखा और मनी ट्रेल
इस घोटाले के दौरान किस प्रकार सरकारी धन को अनधिकृत खाते से निकालकर निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल किया गया, उसके पूरे वित्तीय ट्रेल को इस विस्तृत तालिका के माध्यम से पारदर्शी रूप से समझा जा सकता है:
| वित्तीय और विधिक घटक (Financial Components) | घोटाले का डिजिटल और कागजी रूट (Modus Operandi) | कुल संलिप्त धनराशि (Financial Figures) |
| कुल संचित घोटाला राशि (Total Scam Amount) | वर्ष 2009 से 2014 के बीच छात्रवृत्ति और कॉलेज खातों से अवैध ट्रांसफर (ब्याज सहित)। | ₹2,27,00,000 (₹2.27 करोड़) |
| सीधे निजी खातों में ट्रांसफर (Personal Accounts) | मुख्य आरोपी पीयूष चंद्र भटनागर के व्यक्तिगत बैंक खातों में डायरेक्ट ट्रांसफर की गई रकम। | ₹99,43,000 (~₹1 करोड़) |
| चेक के जरिए अवैध निकासी (Cheque Withdrawals) | विभिन्न अज्ञात और सहयोगी व्यक्तियों के नाम पर जाली व खाली चेकों के माध्यम से निकाली गई राशि। | ₹66,50,000 (₹66.50 लाख) |
| नकद निकासी (Cash Outflow) | बैंक की जीएमएस रोड शाखा के अनधिकृत खाते से की गई डायरेक्ट नकद (कैश) विड्रॉल। | ₹42,50,000 (₹42.50 lakh) |
| अटैच की गई संपत्तियां (Attached Assets) | ईडी द्वारा 27 मई को अस्थायी रूप से कुर्क की गई चल संपत्तियां (बीमा, वाहन, बैंक जमा)। | ₹7,86,000 (₹7.86 लाख) |
बैंक खातों की धोखाधड़ी: लक्ष्मी रोड की अनुमति लेकर जीएमएस रोड में खुला अवैध खाता
प्रवर्तन निदेशालय की तकनीकी और फोरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit) जांच में इस बात का बड़ा खुलासा हुआ है कि इस पूरे घोटाले को अंजाम देने के लिए बैंकों के नियमों और कॉलेज प्रबंधन के आदेशों की धज्जियां उड़ाई गईं।
जांच में सामने आया कि डीएवी (पीजी) कॉलेज प्रबंधन ने मूल रूप से देना बैंक की लक्ष्मी रोड शाखा में एक आधिकारिक खाता खोलने की विधिक प्रशासनिक अनुमति दी थी। लेकिन, इस घोटाले के मुख्य मास्टरमाइंड और कॉलेज के तत्कालीन कर्मचारी पीयूष चंद्र भटनागर ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर दस्तावेजों में भारी कूटरचना और हेरफेर (Forgery of Documents) की। उसने लक्ष्मी रोड शाखा के बजाय देना बैंक की ही जीएमएस रोड (GMS Road) शाखा में एक पूर्णतः अनधिकृत (Unauthorized) और गोपनीय खाता खोल दिया। कॉलेज प्रबंधन की नजरों से छिपाकर इस खाते का संचालन केवल इसलिए किया गया ताकि छात्रवृत्ति के पैसे को इसमें चुपचाप ट्रांसफर किया जा सके और किसी को भनक भी न लगे।
छात्रवृत्ति प्रभारी पीयूष भटनागर के काले कारनामे: ₹99.43 लाख सीधे अपने खातों में डाले
ईडी की चार्जशीट में डीएवी कॉलेज के छात्रवृत्ति प्रभारी (Scholarship In-charge) के रूप में कार्यरत पीयूष चंद्र भटनागर को इस पूरे वित्तीय अपराध का मुख्य सूत्रधार बताया गया है। पीयूष भटनागर ने अपने पद और प्रशासनिक पहुंच का दुरुपयोग करते हुए बैंक के खाता संचालन दस्तावेजों में इस तरह से हेरफेर की कि उसने स्वयं को उस अनधिकृत खाते का 'एकमात्र और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता' (Authorized Signatory) बना लिया।
इसके बाद, समाज कल्याण विभाग से जैसे ही छात्रों की छात्रवृत्ति डीएवी कॉलेज के मुख्य खातों में आती थी, पीयूष भटनागर उसे तुरंत जीएमएस रोड वाले अवैध खाते में डाल देता था। ईडी ने अपनी जांच में पाया कि इस खाते से:
- ₹99.43 लाख की एक बहुत बड़ी राशि सीधे पीयूष भटनागर के व्यक्तिगत बैंक खातों (Personal Bank Accounts) में ट्रांसफर की गई।
- इस रकम को पकड़े जाने से बचाने के लिए पीयूष ने कई अन्य डमी और पारिवारिक बैंक खातों में घुमाया (Layering)।
- इसके बाद इस चुराए गए पैसे का उपयोग महंगी बीमा पॉलिसियां (Insurance Policies) खरीदने, निजी विलासिता के खर्चों, नकद निकासी और अन्य व्यक्तिगत निवेशों में किया गया।
- इसके अतिरिक्त, ₹42.50 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि सीधे कैश (नकद) के रूप में बैंक काउंटर से निकाली गई, जिसका कोई वैध रिकॉर्ड नहीं है।
- समन्वयक रंजना रावत की भूमिका भी आई दायरे में; खाली चेकों पर किए थे दस्तखत
इस बहुचर्चित घोटाले में केवल एक कर्मचारी शामिल नहीं था, बल्कि संस्थागत निगरानी की कमी और मिलीभगत भी इसके लिए जिम्मेदार थी। ईडी की जांच के दायरे में डीएवी कॉलेज की छात्रवृत्ति समन्वयक (Scholarship Coordinator) और कॉलेज खातों की अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता रंजना रावत की भूमिका भी पूरी तरह से उजागर हुई है।
जांच एजेंसी के अनुसार, रंजना रावत ने अपने पद की जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में गंभीर लापरवाही और कथित संलिप्तता दिखाई। उन्होंने कॉलेज के मुख्य और छात्रवृत्ति खातों से जुड़े कई 'ब्लैंक चेक' (Blank Cheques - खाली चेक) पर पहले से ही अपने हस्ताक्षर कर पीयूष भटनागर को सौंप दिए थे। इन्हीं हस्ताक्षरित खाली चेकों का उपयोग भटनागर ने बिना किसी बाधा के सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति राशि को अनधिकृत खातों और बाद में अपने निजी खातों में डायवर्ट करने के लिए किया। ईडी ने रंजना रावत की इस भूमिका को मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध में बराबर का सहयोगी माना है।
ED की अब तक की कार्रवाई और इस घोटाले के 4 बड़े सामाजिक-प्रशासनिक निहितार्थ
इस संवेदनशील घोटाले की जांच के बाद ईडी द्वारा उठाए गए कदमों और इसके कारण व्यवस्था पर उठे चार सबसे बड़े सवालों का विश्लेषण इस प्रकार है:
- चल संपत्तियों की कुर्की (Asset Attachment): ईडी ने विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल करने से ठीक पहले, 27 मई को एक बड़ी कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी पीयूष भटनागर की ₹7.86 लाख मूल्य की चल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क (Attach) कर लिया था। इसमें उसकी निजी बीमा पॉलिसियां, बैंक खातों में जमा अवैध रकम और एक होंडा एक्टिवा दुपहिया वाहन शामिल है।
- कमजोर वर्गों के अधिकारों का हनन: यह पूरा घोटाला सीधे तौर पर समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के उन छात्रों की छात्रवृत्ति से जुड़ा था, जिनके लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करने का एकमात्र सहारा यह सरकारी वित्तीय सहायता ही होती है। इस पैसे के गबन से सैकड़ों छात्रों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई।
- संस्थागत निगरानी (Institutional Oversight) की विफलता: उत्तराखंड के इतने बड़े और प्रतिष्ठित डीएवी कॉलेज में 5 वर्षों (2009-2014) तक प्रबंधन और समाज कल्याण विभाग की नाक के नीचे करोड़ों का घोटाला चलता रहा और किसी भी आंतरिक या बाहरी ऑडिट (External Audit) में इस अनधिकृत खाते का न पकड़ा जाना, प्रशासनिक और ऑडिटिंग व्यवस्था की पोल खोलता है।
- कड़े PMLA कानून के तहत मुकदमा: ईडी ने कोर्ट में बैंक क्रेडेंशियल्स, दस्तावेजों के फॉरेंसिक साक्ष्य, जाली चेकों की प्रतियां और आरोपियों के धारा 50 पीएमएलए के तहत दर्ज बयानों को शामिल किया है, जिसके तहत मनी लॉन्ड्रिंग के दोषियों को 3 से 7 वर्ष तक की कठोर कैद और भारी जुर्माने की सजा का विधिक प्रावधान है।
विशेष पीएमएलए कोर्ट की निगरानी में आगे बढ़ेगी कानूनी लड़ाई
प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्यों और डिजिटल मनी ट्रेल के साथ चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद, अब गेंद पूरी तरह से न्यायपालिका के पाले में चली गई है। देहरादून की स्पेशल पीएमएलए कोर्ट अब इस अभियोजन शिकायत का संज्ञान लेकर आरोपियों को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए समन (Summons) जारी करेगी।
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, पीएमएलए कानून के तहत दर्ज मामलों में जमानत मिलना बेहद कठिन होता है क्योंकि इसमें आरोपी को खुद को बेकसूर साबित करने का जिम्मा (Burden of Proof) कानूनन उसी पर होता है। ईडी के अधिकारियों का कहना है कि यह केवल पहली अभियोजन शिकायत है; यदि जांच के दौरान इस घोटाले से जुड़े कुछ और बड़े सफेदपोश चेहरों या बैंक अधिकारियों की संलिप्तता के नए सबूत मिलते हैं, तो कोर्ट में एक सप्लीमेंट्री (पूरक) चार्जशीट भी दाखिल की जा सकती है।
भ्रष्ट तंत्र पर कड़ा प्रहार और भावी सुशासन के लिए एक सबक
देहरादून के डीएवी छात्रवृत्ति घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय की यह चार्जशीट उत्तराखंड के उन तमाम भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक कड़ा और स्पष्ट संदेश है, जो जन-कल्याण और समाज के गरीब तबके के लिए आने वाले पैसों को अपनी निजी जागीर समझ लेते हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के छात्रों के हक पर डाका डालना न केवल एक गंभीर वित्तीय अपराध है, बल्कि यह एक अक्षम्य सामाजिक पाप भी है, जिसने न जाने कितने होनहार युवाओं के भविष्य के सपनों को असमय ही कुचल दिया।
इस मामले में पीयूष भटनागर के व्यक्तिगत खातों में ₹99.43 लाख का मिलना और रंजना रावत द्वारा खाली चेकों पर दस्तखत करना यह साबित करता है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में आंतरिक वित्तीय नियंत्रण (Internal Financial Control) किस कदर ध्वस्त था। हालांकि देर से ही सही, लेकिन ईडी द्वारा पुख्ता मनी ट्रेल के साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाना यह उम्मीद जगाता है कि दोषियों को उनके किए की कड़ी सजा अवश्य मिलेगी। उत्तराखंड सरकार को इस घोटाले से सबक लेते हुए राज्य के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त कॉलेजों में छात्रवृत्ति वितरण के लिए 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (DBT) और डिजिटल मैपिंग को और अधिक मजबूत करना चाहिए, ताकि भविष्य में फिर कभी कोई पीयूष भटनागर किसी गरीब छात्र की शिक्षा और उसके सुनहरे भविष्य को न निगल सके।
