Aapki Media AI
नई दिल्ली | 27 अप्रैल, 2026 : भारत में डिजिटल कंटेंट की निगरानी और उसे हटाने की प्रक्रिया अब एक नए मोड़ पर पहुँच गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) का 'सहयोग' पोर्टल इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। जहाँ एक ओर सरकार इसे ऑनलाइन सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए जरूरी बता रही है, वहीं दूसरी ओर तकनीकी विशेषज्ञ और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इसके 'अपारदर्शी' स्वभाव पर सवाल उठा रहे हैं।
क्या है 'सहयोग' पोर्टल?
'सहयोग' पोर्टल कानून प्रवर्तन एजेंसियों (LEA) के लिए बनाया गया एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इसका मुख्य उद्देश्य आपत्तिजनक ऑनलाइन कंटेंट को हटाने की प्रक्रिया को तेज और ऑटोमैटिक बनाना है।
- यह पोर्टल अधिकृत पुलिस अधिकारियों को सीधे सोशल मीडिया मध्यस्थों (Intermediaries) से संवाद करने और बड़ी संख्या में कंटेंट हटाने के आदेश देने की सुविधा देता है।
- यह सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 79(3)(b) और मध्यस्थ दिशानिर्देश 2021 के नियम 3(1)(d) के तहत काम करता है।
- गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट (2024-25) के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक इस पोर्टल के माध्यम से 1,11,185 संदिग्ध सामग्रियों को ब्लॉक किया जा चुका है।
मेटा बनाम एक्स (X): दो अलग रास्ते
पोर्टल के जरिए मिलने वाले नोटिसों पर दुनिया की दो सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों का रवैया बिल्कुल अलग नजर आ रहा है:
| विशेषता | मेटा (Facebook/Instagram) | एक्स कॉर्प (X) |
| प्रतिक्रिया | नोटिस मिलते ही कंटेंट तक पहुंच तुरंत रोक देता है। | केवल कानूनी रूप से सही नोटिसों का ही पालन करता है। |
| कानूनी रुख | सरकार के आदेशों का बड़े पैमाने पर पालन। | कर्नाटक हाईकोर्ट में 'सहयोग' पोर्टल को चुनौती दी है। |
| बहाली प्रक्रिया | गलत तरीके से हटने पर भी खुद बहाल नहीं करता; सरकारी आदेश का इंतजार। | सामग्री वैध होने पर हटाने से इनकार कर देता है। |
विशेषज्ञों की चिंता: 'बिना सोचे-समझे सेंसरशिप'
टेक लॉ और पॉलिसी कंसल्टेंट प्रानेश प्रकाश के अनुसार, मेटा अक्सर ऐसा कंटेंट भी हटा रहा है जिसे हटाने की उसे कानूनी रूप से कोई आवश्यकता नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि पोर्टल के जरिए कंटेंट हटाने की प्रक्रिया में किसी स्वतंत्र समीक्षा (Independent Review) का प्रावधान नहीं है, जिससे राजनीतिक आलोचना और व्यंग्य को भी निशाना बनाया जा सकता है।
"यह पोर्टल सरकार को आईटी कानून की धारा 69(A) की जटिल प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सीधे सेंसरशिप लागू करने की शक्ति देता है, जो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए चिंताजनक है।" — विशेषज्ञ राय
हालिया उदाहरण: गोवा पुलिस की कार्रवाई
1 अप्रैल को गोवा पुलिस ने एक इंस्टाग्राम अकाउंट ‘deepakdialoguess’ के खिलाफ शिकायत दर्ज की। आरोप था कि यह अकाउंट मुख्यमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट कर रहा है। बिना किसी खास पोस्ट का जिक्र किए, इस अकाउंट को (जिसके 1.5 लाख फॉलोअर्स हैं) भारत में पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया।
पारदर्शिता का अभाव
'सहयोग' पोर्टल ने कंटेंट हटाने की शक्ति को केवल आईटी मंत्रालय तक सीमित न रखकर हर राज्य के पुलिस अधिकारियों तक पहुँचा दिया है। हालांकि यह साइबर अपराधों पर लगाम लगाने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसकी अपारदर्शिता और एकतरफा कार्रवाई की क्षमता आने वाले समय में एक बड़ी कानूनी और नैतिक चुनौती पेश कर सकती है। उम्मीद है कि मेटा 2026 की दूसरी छमाही में हटाए गए कंटेंट की विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा, जिससे स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
