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काशीपुर (उधम सिंह नगर), 12 मई, 2026: उत्तराखंड के काशीपुर और इसके तराई क्षेत्रों में संचालित हो रहे निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों के आर्थिक शोषण की शिकायतों का शिक्षा विभाग ने अब कड़ा संज्ञान लिया है। नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ ही कई निजी स्कूलों द्वारा फीस में बेतहाशा वृद्धि और कमीशन के चक्कर में निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें थोपने के मामले सामने आए थे।
इन शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाते हुए माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती ने स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि निजी स्कूलों की 'मनमानी' अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। विभाग ने साफ कर दिया है कि जो स्कूल सरकारी मानकों और नियमों का उल्लंघन करेंगे, उनकी मान्यता (Recognition) और एनओसी (NOC) तत्काल प्रभाव से रद्द करने की कार्रवाई शुरू की जाएगी। इस आदेश के बाद क्षेत्र के शिक्षा जगत में हड़कंप मच गया है।
फीस वृद्धि का नियम: 3 साल में केवल एक बार ही बढ़ेगी फीस
शिक्षा विभाग ने निजी स्कूलों के लिए बने 'फीस एक्ट' और नियमावली को पुन: दोहराते हुए सख्त निर्देश जारी किए हैं।
- अनिवार्य सहमति: सरकारी नियमों के अनुसार, कोई भी निजी स्कूल 3 साल में केवल एक बार ही अपनी फीस बढ़ा सकता है।
- अभिभावकों की राय: फीस बढ़ाने से पहले स्कूल प्रबंधन के लिए 'अभिभावक-शिक्षक संघ' (PTA) की बैठक बुलाना और अभिभावकों की सहमति लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
- उल्लंघन पर कार्रवाई: विभाग को जानकारी मिली है कि काशीपुर के कई स्कूल हर साल विकास शुल्क और अन्य मदों के नाम पर गुपचुप तरीके से फीस बढ़ा रहे हैं। ऐसे स्कूलों को अब चिन्हित किया जा रहा है।
किताबों का खेल: NCERT अनिवार्य, निजी कोर्स पर 'नो एंट्री'
निजी प्रकाशकों और स्कूलों के बीच 'कमीशन' के खेल को खत्म करने के लिए शिक्षा विभाग ने कड़े निर्देश दिए हैं।
- NCERT ही विकल्प: सभी निजी स्कूलों को निर्देशित किया गया है कि वे केवल NCERT की किताबें ही पाठ्यक्रम में लागू करें।
- महंगी किताबों पर रोक: अभिभावकों पर किसी विशेष दुकान से या निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें (Private Course) खरीदने के लिए दबाव बनाना अपराध की श्रेणी में माना जाएगा।
- चेतावनी: यदि किसी स्कूल में निजी प्रकाशकों की किताबें पढ़ाते हुए पाई गईं, तो विभाग इसे नियमों का घोर उल्लंघन मानते हुए सख्त एक्शन लेगा।
शिक्षा विभाग की नई नियमावली: एक नजर में
| नियम की श्रेणी | सरकारी मानक/निर्देश | उल्लंघन पर दंड |
| फीस वृद्धि | 3 वर्ष में केवल एक बार (सहमति अनिवार्य) | भारी अर्थदंड और नोटिस |
| पाठ्यक्रम/किताबें | केवल NCERT किताबें मान्य | एनओसी (NOC) की वापसी |
| निगरानी अधिकारी | मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) और BEO | लापरवाही पर अधिकारियों की जवाबदेही |
| शिकायत निवारण | अभिभावक सीधे विभाग में कर सकते हैं शिकायत | तत्काल जांच और कार्रवाई |
निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती के कड़े निर्देश: अधिकारियों को 'फील्ड' में उतरने के आदेश
माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने केवल स्कूलों को ही नहीं, बल्कि विभागीय अधिकारियों को भी सक्रिय होने के निर्देश दिए हैं।
- कड़ी निगरानी: सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों (CEO) और खंड शिक्षा अधिकारियों (BEO) को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में स्कूलों का औचक निरीक्षण करें।
- जवाबदेही तय: यदि किसी क्षेत्र में निजी स्कूल की मनमानी की शिकायत आती है और संबंधित खंड शिक्षा अधिकारी ने उस पर कार्रवाई नहीं की है, तो अधिकारी के खिलाफ भी विभागीय जांच की जाएगी।
- प्रशासनिक एक्शन: विभाग आने वाले दिनों में प्रशासन के साथ मिलकर एक बड़ी संयुक्त कार्रवाई (Joint Action) करने की तैयारी में है।
अभिभावकों में जगी उम्मीद, स्कूलों में हड़कंप
काशीपुर के अभिभावकों ने विभाग के इस कदम का स्वागत किया है। लंबे समय से अभिभावक संघ यह मांग कर रहा था कि निजी स्कूलों की 'व्यापारिक' मानसिकता पर अंकुश लगाया जाए।
"स्कूलों ने शिक्षा को व्यवसाय बना लिया है। हर साल ड्रेस बदलना, जूते बदलना और महंगी किताबें खरीदना मध्यम वर्गीय परिवार के लिए असंभव होता जा रहा है। विभाग की सख्ती से हमें राहत मिलने की उम्मीद है।" — एक स्थानीय अभिभावक।
प्रमुख चेतावनी बिंदु
निजी स्कूलों को इन बिंदुओं पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है:
- यूनिफॉर्म का दबाव: हर साल या 2 साल में स्कूल ड्रेस बदलने का दबाव नहीं बनाया जा सकता।
- दुकान फिक्सिंग: स्कूल प्रबंधन किसी विशेष वेंडर या दुकान से ही सामान खरीदने के लिए मजबूर नहीं करेगा।
- पारदर्शिता: स्कूल की वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर फीस संरचना (Fee Structure) का पूर्ण विवरण होना अनिवार्य है।
- एनओसी रद्दीकरण: यदि कोई स्कूल बार-बार चेतावनी के बाद भी नियम तोड़ता है, तो उसकी राज्य सरकार द्वारा दी गई एनओसी वापस ले ली जाएगी, जिससे स्कूल का संचालन बंद हो सकता है।
शिक्षा के बाजारीकरण पर लगाम की जरूरत
शिक्षा विभाग का यह 'हंटर' काशीपुर के उन स्कूलों के लिए एक बड़ा सबक है जो शिक्षा के मंदिर को मुनाफे की मशीन मान बैठे थे। डॉ. मुकुल कुमार सती के निर्देश यदि जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू होते हैं, तो यह न केवल अभिभावकों के लिए आर्थिक राहत होगी, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार लाएगा। अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग के निचले स्तर के अधिकारी इन आदेशों का कितना कड़ाई से पालन करवाते हैं और कितने 'दागी' स्कूलों की मान्यता वास्तव में रद्द होती है।
