पारिवारिक उत्सवों में नशामुक्ति का 'बसुकेदार मॉडल': युवा कवि सतपाल की पहल पर शराब की जगह सजा कवि सम्मेलन


Aapki Media AI


बसुकेदार/रुद्रप्रयाग, 26 जून, 2026: उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचलों में पारिवारिक उत्सवों, मुंडन, विवाह और संस्कारों के अवसरों पर बढ़ती नशाखोरी और शराब परोसने की आधुनिक सामाजिक विकृति के बीच रुद्रप्रयाग जनपद से एक बेहद प्रेरणादायी और अनुकरणीय संदेश सामने आया है। जनपद रुद्रप्रयाग की तहसील बसुकेदार के अंतर्गत युवा कवि सतपाल की प्रगतिशील सोच और अनूठी पहल पर उनके प्रिय भांजे 'समृद्ध' के पारंपरिक अन्नप्राशन संस्कार (शिशु को पहली बार अन्न चखाने का वैदिक अनुष्ठान) को एक महान सामाजिक आंदोलन और सांस्कृतिक महोत्सव का रूप दे दिया गया।

 

पारिवारिक उत्सवों में नशामुक्ति का 'बसुकेदार मॉडल': युवा कवि सतपाल की पहल पर शराब की जगह सजा कवि सम्मेलन


इस शुभ अवसर पर स्याला और भारती परिवार ने समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी 'शराब परोसने और नशे के प्रदर्शन' की कुप्रथा को पूरी तरह से विधिक और नैतिक रूप से खारिज कर दिया। समारोह को पूरी तरह मद्यपान-मुक्त (Alcohol-Free) रखते हुए इसके स्थान पर देवभूमि के प्रतिष्ठित कवियों, लोक कलाकारों और विचारकों की उपस्थिति में एक भव्य कवि सम्मेलन, शास्त्रीय व लोक संगीत कार्यक्रम तथा प्रबुद्ध जन सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक पहल का मूल विज़न यह सिद्ध करना था कि पारिवारिक खुशियों को बिना किसी हुड़दंग और नशे के, साहित्य और अपनी जड़ों से जुड़कर अधिक गरिमापूर्ण बनाया जा सकता है।



सांस्कृतिक नीति एवं प्रभाव: विचारों का संवर्धन बनाम नशे से खोखला होता समाज



इस अनूठे आयोजन के दौरान उपस्थित वक्ताओं और बुद्धिजीवियों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि समकालीन समाज में किसी भी पारिवारिक उत्सव की सफलता को 'शराब के उपभोग' से आंका जाने लगा है, जिससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि युवा पीढ़ी गर्त में जा रही है।

  1. परिवर्तन की धरातलीय शुरुआत: कवि सतपाल की इस पहल ने समाज को यह सिखाया कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए बड़े भाषणों की नहीं, बल्कि अपने ही घर से छोटे-छोटे निर्णयों की आवश्यकता होती है।
  2. साहित्यिक समागम: जब उत्सव में शराब की जगह कविता, सुरीले लोकगीतों और ज्ञानवर्धक चर्चाओं ने ली, तो पूरा वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर गया। कलाकारों की अद्भुत कलाकृतियों और छंदों ने न केवल उपस्थित ग्रामवासियों का मनोरंजन किया, बल्कि उन्हें अपनी समृद्ध पहाड़ी विरासत पर गर्व करने का अवसर भी प्रदान किया।

 



बसुकेदार सामाजिक नशामुक्ति एवं सांस्कृतिक मॉडल: आयोजन डेटा मैट्रिक्स 



इस अनुकरणीय पारिवारिक-सामाजिक महोत्सव के विभिन्न घटकों, प्रमुख सहभागियों और इसके दूरगामी सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को इस प्रशासनिक और तकनीकी डेटा तालिका में रेखांकित किया गया है:

सामाजिक, सांस्कृतिक एवं नीतिगत पैरामीटर्सबसुकेदार (रुद्रप्रयाग) ग्राउंड जीरो डेटा (2026)सामाजिक चेतना एवं विधिक सुशासन का सीधा प्रभाव
मुख्य आयोजन एवं पारंपरिक संस्कारबालक 'समृद्ध' का अन्नप्राशन संस्कार।वैदिक रीति-रिवाजों और नैतिक मूल्यों का बाल्यकाल से ही बीजारोपण।
परिवर्तित कुप्रथा (नकारात्मक तत्व)प्रचलित शराब और मद्यपान परोसने की रीत।पारिवारिक विघटन, आर्थिक क्षति और घरेलू हिंसा के मुख्य कारक पर विधिक रोक।
प्रतिस्थापित सुधारात्मक विकल्पभव्य कवि सम्मेलन, लोक संगीत एवं सम्मान समारोह।युवाओं को रचनात्मकता, साहित्य लेखन और कला के प्रति प्रेरित करने का मंच।
मुख्य सांस्कृतिक व संगीत नेतृत्वलोक गायिका खुशी नेगी, कवि श्रीकांत, राकेश जिर्वाण 'हंस'।स्थानीय लोक कला और युवा प्रतिभाओं को पहचान और नैतिक संबल।
मुख्य वैचारिक और मीडिया प्रहारीशैलेंद्र सकलानी (हिलमैन न्यूज़), उमेश लिंगवाल, शांति लाल।सकारात्मक पत्रकारिता के माध्यम से कुप्रथाओं के खिलाफ लोक विमर्श का निर्माण।
आयोजक पारिवारिक मार्गदर्शकदादा जगदीश भारती, पूर्व प्रधान देवकी देवी, सुधाकर स्याला।ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज और वरिष्ठ नागरिकों द्वारा सुशासन की मिसाल।
दीर्घकालिक नीतिगत समाज प्रभाव'सांस्कृतिक पुनरुत्थान और आत्मनिर्भर समाज' का विजन।सतत विकास लक्ष्यों (SDG-3: उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली) का स्थानीयकरण।


पारिवारिक उत्सवों में नशामुक्ति का 'बसुकेदार मॉडल': युवा कवि सतपाल की पहल पर शराब की जगह सजा कवि सम्मेलन


 

प्रबुद्ध जनों का सम्मान: प्रतिभाओं को प्रोत्साहन और समाज को नई दिशा देने का संकल्प


इस समारोह का एक और सबसे खूबसूरत पहलू यह रहा कि इसमें केवल खुशियाँ मनाई ही नहीं गईं, बल्कि समाज की बौद्धिक संपदा को सम्मानित भी किया गया। नागनाथ पोखरी से आईं उभरती हुई युवा लोक गायिका खुशी नेगी, युवा कवि श्रीकांत, राकेश जिर्वाण 'हंस', उत्तम राज, आशा चमोला, सोनम काला सहित पूरी संगीत टीम और मीडिया प्रतिनिधियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


नशामुक्ति और सांस्कृतिक गौरव पर प्रबुद्ध समाज का संयुक्त संदेश:

 

पारिवारिक उत्सवों में नशामुक्ति का 'बसुकेदार मॉडल': युवा कवि सतपाल की पहल पर शराब की जगह सजा कवि सम्मेलन

"नशा और शराब जहाँ एक ओर व्यक्ति की सोच, परिवार की आर्थिक रीढ़ और पूरे समाज के ताने-बाने को भीतर से खोखला और कमजोर कर देते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारा लोक संगीत मन को असीम आनंद देता है, साहित्य हमारे विचारों को नई धार देता है और हमारी सनातन संस्कृति हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती है। यदि उत्तराखण्ड के प्रत्येक गांव और प्रत्येक परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों से नशे को विधिक और सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिया जाए, तो देवभूमि की सांस्कृतिक पवित्रता स्वतः ही पुनर्स्थापित हो जाएगी। कवि सतपाल का यह प्रयास अनुकरणीय है और यह समाज को बदलने का सबसे व्यावहारिक जरिया है।"


 

पारिवारिक आयोजनों को 'संस्कृति उन्मुख' बनाने हेतु 4 मुख्य रणनीतिक उपाय 


स्याला और भारती परिवार द्वारा भविष्य में भी ऐसे रचनात्मक कार्यक्रम जारी रखने के संकल्प के बीच, समाजशास्त्रियों ने इस 'बसुकेदार मॉडल' को पूरे राज्य में लागू करने के लिए चार मुख्य सुझाव दिए हैं:


  • 'नशा-मुक्त विवाह/उत्सव' की विधिक शपथ: प्रत्येक ग्राम सभा को अपने स्तर पर प्रस्ताव पारित करना चाहिए कि जो परिवार अपने आयोजनों को पूर्णतः नशा-मुक्त रखेंगे, उन्हें पंचायत स्तर पर विशेष सामाजिक प्रोत्साहन और सम्मान दिया जाएगा।
  • स्थानीय कलाकारों को रोजगार और मंच: आयोजनों के बजट का एक हिस्सा महंगी विदेशी शराब पर उड़ाने के बजाय, स्थानीय लोक कलाकारों, संगीतकारों और ढोल-दमाऊ वादकों को आमंत्रित कर उनकी आजीविका को संबल प्रदान किया जाए।
  • युवाओं हेतु 'बुक-गिफ्टिंग' (पुस्तकों का उपहार): मांगलिक अवसरों पर मेहमानों को रिटर्न गिफ्ट के रूप में या बच्चों को उपहार के तौर पर खिलौनों के स्थान पर ज्ञानवर्धक साहित्य, महापुरुषों की जीवनियाँ और उत्तराखंड के इतिहास से जुड़ी पुस्तकें भेंट की जाएं।
  • वरिष्ठ नागरिकों और पूर्व जनप्रतिनिधियों की विधिक भूमिका: जैसे इस कार्यक्रम में पूर्व प्रधान देवकी देवी ने कड़ा निर्णय लिया, वैसे ही गांवों के वरिष्ठ मातृशक्ति समूहों को आगे आकर पारिवारिक दबावों को दरकिनार कर शराबबंदी को स्वैच्छिक रूप से लागू करवाना होगा।

 

'श्रेष्ठ उत्तराखंड' के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगी यह पहल 


26 जून 2026 को रुद्रप्रयाग के बसुकेदार में संपन्न हुआ यह अन्नप्राशन संस्कार केवल एक नवजात शिशु के पारंपरिक भोजन ग्रहण करने का उत्सव मात्र नहीं था, बल्कि यह बदलते हुए पहाड़ी समाज की उस प्रगतिशील सोच का जीवंत प्रतीक था जो आधुनिकता की अंधी दौड़ में भी अपनी लोक मर्यादाओं को सहेज कर रखना चाहती है।

युवा कवि सतपाल की यह कूटनीतिक और सांस्कृतिक पहल इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि हमारी युवा पीढ़ी ठान ले, तो वह बिना किसी सरकारी दबाव या कानून के, केवल अपनी वैचारिक सुदृढ़ता से समाज की बड़ी से बड़ी विसंगति का अंत कर सकती है। बालक समृद्ध के दीर्घायु, यशस्वी और संस्कारवान भविष्य की कामना के साथ शुरू हुआ यह सामाजिक अभियान आने वाले समय में संपूर्ण उत्तराखण्ड के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ (Beacon of Light) के रूप में याद रखा जाएगा।




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Krishna Kumar
लेखक के बारे में

कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 6+ साल पहले 'आपकी मीडिया' जैसे बहुआयामी संस्थान... और पढ़ें
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