कलियर शरीफ: मदरसा गुलज़ारे फरीद, दरगाह हज़रत बाबा गरीब शाह साबरी से आज शुक्रवार को छड़ी मुबारक का ऐतिहासिक जत्था अजमेर शरीफ के लिए रवाना हुआ। यह यात्रा सज्जादा नशीन बाबा रमज़ान शाह साबरी की सरपरस्ती और बाबा मुदस्सिर साबरी खलीफा की सदारत में प्रारंभ हुई। इस साल 46 लोगों का काफिला छड़ी मुबारक के साथ रवाना हुआ, जो आगामी 24 दिनों तक पैदल सफर तय करेगा और अजमेर शरीफ में हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह के सालाना उर्स में शिरकत करेगा।
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| अजमेर शरीफ के लिए छड़ी मुबारक का जत्था रवाना, |
70 वर्षों से चली आ रही अनोखी आध्यात्मिक परंपरा
बताया जाता है कि यह छड़ी मुबारक का सफर लगभग 70 वर्षों से लगातार जारी है। इसकी शुरुआत हज़रत बाबा गरीब शाह साबरी ने अपनी हयात में ही की थी, ताकि हज़रत बख्तियार काकी रहमतुल्ला अलैह की सुन्नत को आगे बढ़ाया जा सके। काफिला हर साल जमादुल आखिर के चांद की 6 तारीख को कलियर शरीफ से रवाना होकर निम्न मार्ग से गुजरता है:
- पुरकाजी
- मुजफ्फरनगर
- मेरठ
- मोहननगर
- दिल्ली: हज़रत निजामुद्दीन औलिया रह०
- महरौली: हज़रत बख्तियार काकी रह०
- नूह
- जयपुर
24 दिनों की लंबी पैदल यात्रा के बाद काफिला जमादुल आखिर की 29 तारीख को अजमेर शरीफ पहुंचता है।
उर्स में विशेष परंपरा: परचम कुशाई का सम्मान
अजमेर शरीफ पहुंचकर यह साबरी काफिला हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती हिंदलवली के सालाना उर्स के संदल में शिरकत करता है। परंपरा के अनुसार, दरगाह शरीफ के बुलंद दरवाज़े पर परचम कुशाई का मौका इसी काफिले को मिलता है। उर्स के समापन के बाद काफिला अपने वतन मदरसा गुलज़ारे फरीद, कलियर शरीफ लौट आता है।
आध्यात्मिक भक्ति, सामूहिक सद्भाव और सदियों पुरानी रूहानी परंपरा का प्रतीक
छड़ी मुबारक का यह सफर न सिर्फ एक धार्मिक यात्रा है, बल्कि अद्वितीय आध्यात्मिक विरासत, सूफी परंपरा और हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी माना जाता है।
