मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में सोमवार को एक ऐतिहासिक मोड़ आया जब विधानसभा ने 'महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता विधेयक, 2026' (धर्मांतरण विरोधी कानून) को पारित कर दिया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा पेश किए गए इस विधेयक को सत्ताधारी महायुति के साथ-साथ विपक्षी खेमे से शिवसेना (UBT) का भी अप्रत्याशित समर्थन मिला। हालांकि, कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार गुट) ने इसे असंवैधानिक बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।
विधेयक की मुख्य बातें: एक नज़र में
| विवरण | प्रमुख जानकारी |
| विधेयक का नाम | महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता विधेयक, 2026 |
| मुख्य उद्देश्य | जबरन, लालच या धोखे से धर्मांतरण रोकना |
| समर्थक दल | भाजपा, शिवसेना (एकनाथ शिंदे), राकांपा (अजीत पवार), शिवसेना (UBT) |
| विरोधी दल | कांग्रेस, एनसीपी (SP), समाजवादी पार्टी, CPI (M) |
| मुख्य प्रावधान | नाबालिगों के धर्मांतरण पर सख्त सजा, पुलिस को स्वतः संज्ञान का अधिकार |
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का तर्क: क्यों जरूरी है यह कानून?
सदन में विधेयक पेश करते हुए मुख्यमंत्री फडणवीस ने स्पष्ट किया कि यह कानून किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाने के लिए नहीं है। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित रहे:
- कानून-व्यवस्था की स्थिति: मुख्यमंत्री ने कहा कि जबरन धर्म परिवर्तन और अंतरधार्मिक विवाहों से उपजे विवाद अक्सर हिंसक रूप ले लेते हैं, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ती है।
- मौजूदा कानूनों में कमी: उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) में अवैध धर्मांतरण को लेकर कोई स्पष्ट और विशेष प्रावधान नहीं हैं, जिससे दोषियों को सजा दिलाने में मुश्किल होती है।
- अन्य राज्यों का उदाहरण: महाराष्ट्र अब उन 12 राज्यों की सूची में शामिल हो गया है (जैसे ओडिशा, कर्नाटक, हरियाणा, राजस्थान) जहाँ पहले से ही ऐसे कड़े कानून लागू हैं।
- व्यापक परिभाषा: इस कानून के दायरे में लालच (Allurement), दबाव (Coercion), धोखाधड़ी और गलत जानकारी देकर कराए गए धर्मांतरण को शामिल किया गया है।
सियासी समीकरण: शिवसेना (UBT) का समर्थन और विपक्ष की दरार
इस विधेयक पर वोटिंग के दौरान विपक्ष दो फाड़ नजर आया। जहाँ कांग्रेस और सपा ने इसे 'विभाजनकारी' बताया, वहीं उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) ने सरकार का साथ दिया।
उद्धव ठाकरे का बयान: "अगर कोई मजबूरी का फायदा उठाकर या झूठा लालच देकर धर्मांतरण करा रहा है, तो हम इसके खिलाफ हैं। हम धर्म की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, लेकिन शोषण के नहीं।"
विपक्षी विधायक जितेंद्र आव्हाड (NCP-SP) ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह "धर्म की स्वतंत्रता" नहीं बल्कि "धर्म पर नियंत्रण" करने का प्रयास है। अमीन पटेल और अबू आजमी जैसे नेताओं ने निजता के अधिकार (Privacy) के उल्लंघन का हवाला देते हुए इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग की।
विधेयक के सख्त प्रावधान: क्या बदलेगा?
यह प्रस्तावित कानून पुलिस और प्रशासन को व्यापक अधिकार देता है:
- स्वतः संज्ञान (Suo Moto): पुलिस को अब किसी शिकायत का इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी; वे संदिग्ध गैर-कानूनी धर्मांतरण पर खुद कार्रवाई कर सकेंगे।
- संस्थाओं पर कार्रवाई: धर्मांतरण में मदद करने वाले संगठनों या व्यक्तियों को भी समान रूप से दोषी माना जाएगा।
- नाबालिगों का संरक्षण: यदि धर्मांतरण किसी नाबालिग का कराया जाता है, तो सजा के प्रावधान और भी अधिक कड़े होंगे।
आगे की राह: विधान परिषद की चुनौती
विधानसभा से पास होने के बाद अब यह विधेयक विधान परिषद (Legislative Council) में पेश किया जाएगा। चूंकि यहाँ विपक्ष की संख्या बल की स्थिति अलग है, इसलिए वहां तीखी बहस और संशोधन के सुझावों की उम्मीद है।
महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता विधेयक, 2026 राज्य की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कदम है। जहाँ सरकार इसे 'सामाजिक सुरक्षा' का कवच बता रही है, वहीं आलोचक इसे 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' पर प्रहार मान रहे हैं। आने वाले दिनों में यह कानून कानूनी चुनौतियों और न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी आ सकता है।
