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देहरादून, 30 मई, 2026: उत्तराखंड की जीवनदायिनी नदियों, विशेषकर पतित पावनी गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण, सीवरेज नेटवर्क के सुदृढ़ीकरण तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) को लेकर देहरादून जिला प्रशासन अब पूरी तरह से 'एक्शन मोड' में आ गया है। शुक्रवार देर शाम कलेक्ट्रेट स्थित ऋषिपर्णा सभागार में आयोजित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और हाई-प्रोफाइल बैठक में जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने जिला गंगा संरक्षण समिति के साथ-साथ अर्धकुंभ मेला 2027 के लिए प्रस्तावित बुनियादी ढांचागत कार्यों की गहन और बिंदुवार समीक्षा की।
बैठक के दौरान जिलाधिकारी का रुख बेहद कड़ा और आक्रामक रहा। उन्होंने सरकारी विभागों की पारंपरिक सुस्ती और कागजी दावों पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए स्पष्ट और दोटूक शब्दों में चेतावनी दी:
| जिलाधिकारी देहरादून डॉ. आशीष चौहान कार्यवाही के आदेश देते हुए |
"गंगा संरक्षण, स्वच्छता कार्यों और सीवर परियोजनाओं में किसी भी स्तर पर ढिलाई या लापरवाही को अब कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अधिकारी यह अच्छी तरह समझ लें कि मुझे केवल स्मार्ट प्रजेंटेशन (प्रस्तुतिकरण) और फाइलों के लंबे-चौड़े आंकड़ों में कोई दिलचस्पी नहीं है। जब तक धरातल (Ground Level) पर कार्यों के सकारात्मक और दृश्यमान परिणाम दिखाई नहीं देंगे, तब तक किसी भी परियोजना को सफल नहीं माना जाएगा।"
एनजीटी के मानकों पर चलें सभी एसटीपी; टपकेश्वर भूमि विवाद पर नाराजगी
जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने जनपद के पर्यावरण और जल जनित स्वास्थ्य की समीक्षा करते हुए जल संस्थान और परियोजना प्रबंधन निर्माण एवं अनुरक्षण इकाई (गंगा) के अधिशासी अभियंताओं को कड़े निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि देहरादून जिले के भीतर संचालित होने वाले सभी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT - National Green Tribunal) द्वारा निर्धारित कड़े पर्यावरण मानकों के अनुरूप ही संचालित होने चाहिए। यदि किसी भी एसटीपी से शोधित (Treated) पानी मानकों से खराब पाया गया, तो संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी।
इसके साथ ही, देहरादून के ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण टपकेश्वर मंदिर (गढ़ी कैंट क्षेत्र) में प्रस्तावित एसटीपी निर्माण कार्य की समीक्षा के दौरान जिलाधिकारी ने भूमि चयन की प्रक्रिया में हो रही अत्यधिक देरी पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। लालफीताशाही (Bureaucracy) को फटकार लगाते हुए उन्होंने निर्देश दिए कि संबंधित सभी लाइन डिपार्टमेंट्स और सैन्य अधिकारियों के साथ एक अलग से विशेष बैठक आयोजित की जाए और भूमि हस्तांतरण की कार्यवाही को बिना किसी देरी के तत्काल पूर्ण किया जाए।
लंबित और निर्माणाधीन परियोजनाओं की प्रशासनिक स्थिति एवं डीएम के निर्देश
इस विस्तृत तालिका के माध्यम से समझा जा सकता है कि बैठक में किन महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर जिलाधिकारी द्वारा कड़ा रुख अपनाया गया और क्या समय-सीमा तय की गई:
| परियोजना / क्षेत्र का नाम | वर्तमान प्रशासनिक स्थिति | देरी का मुख्य कारण | जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान का कड़ा निर्देश |
| ऋषिकेश एसटीपी व सीवर लाइन | निर्माणाधीन चरण में | धीमी गति, समन्वय की कमी | निर्धारित समय-सीमा (Deadline) के भीतर कार्य हर हाल में शत-प्रतिशत पूर्ण किए जाएं। |
| कैमल बैक एसटीपी (मसूरी) | वर्ष 2022 से बजट स्वीकृत, काम ठप | पेयजल निगम की गंभीर लापरवाही | संबंधित अधिकारियों को कार्यप्रणाली सुधारने की अंतिम चेतावनी, विभागीय जांच के संकेत। |
| अर्केडिया जोन एसटीपी (0.70 MLD) | वर्ष 2022 से फाइलों में स्वीकृत | भूमि चिन्हींकरण और म्यूटेशन का लंबित रहना | संयुक्त मजिस्ट्रेट मसूरी को मामले की जांच कर 7 दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के आदेश। |
| बिंदाल नदी नाला टैपिंग | कछुआ गति से कार्य जारी | पेयजल निगम की सुस्ती | आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर नालों की टैपिंग और नियमित सफाई समयबद्ध पूरी हो। |
| आवास विकास वार्ड (ऋषिकेश) | सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पायलट प्रोजेक्ट | जीआईजेड के साथ संयुक्त संचालन | इस वार्ड को तत्काल एक 'मॉडल वार्ड' के रूप में विकसित कर अन्य वार्डों में लागू करें। |
लापरवाह अधिकारियों पर गिरी गाज: नगर निगम अफसर को कारण बताओ नोटिस
प्रशासनिक अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाले जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने बैठक में अधिकारियों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर कड़ा एक्शन लिया। जब बैठक में नगरीय क्षेत्रों के भीतर संचालित होने वाली डेरियों से निकलने वाले अपशिष्ट (Dairy Waste Management) के वैज्ञानिक प्रबंधन की रिपोर्ट मांगी गई, तो नगर निगम देहरादून के संबंधित जिम्मेदार अधिकारी बैठक से बिना किसी पूर्व सूचना के अनुपस्थित पाए गए।
इस घोर लापरवाही और प्रशासनिक अनुशासनहीनता पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए जिलाधिकारी ने तत्काल प्रभाव से संबंधित अधिकारी के विरुद्ध 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) जारी करने के निर्देश दिए। उन्होंने साफ किया कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के स्तर से जिन कार्यों की मॉनिटरिंग की जा रही हो, उसमें किसी भी अधिकारी की अनुपस्थिति को सेवा नियमावली के उल्लंघन के रूप में देखा जाएगा।
मसूरी और अर्केडिया एसटीपी में 4 साल की देरी पर बैठाई जांच; 7 दिन में मांगी रिपोर्ट
बैठक का सबसे बड़ा और कड़ा फैसला पर्यटन नगरी मसूरी और अर्केडिया जोन की दो प्रमुख सीवरेज परियोजनाओं को लेकर आया। मसूरी क्षेत्र में 0.70 एमएलडी (MLD) क्षमता के कैमल बैक एसटीपी की समीक्षा के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 2022 में ही इस परियोजना के लिए भारी-भरकम बजट स्वीकृत हो चुका था, लेकिन आज 4 साल बीतने के बाद भी धरातल पर निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है। इस पर जिलाधिकारी ने पेयजल निगम मसूरी के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी।
इसी तरह, अर्केडिया जोन में प्रस्तावित 0.70 एमएलडी एसटीपी परियोजना की फाइलें भी वर्ष 2022 से प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त होने के बावजूद धूल फांक रही थीं। यहां आज तक भूमि चिन्हींकरण और म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) की मामूली कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी। इस पर कड़ा असंतोष व्यक्त करते हुए जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने संयुक्त मजिस्ट्रेट मसूरी (Joint Magistrate Mussoorie) को पूरे मामले की उच्च स्तरीय मजिस्ट्रेटी जांच सौंप दी है। संयुक्त मजिस्ट्रेट को इस लेटलतीफी के असली गुनाहगारों को बेनकाब करते हुए सात दिनों के भीतर अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट जिलाधिकारी कार्यालय को सौंपनी होगी।
स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए 4 मुख्य प्रशासनिक स्तंभ
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी और मुख्य सचिव के 'क्लीन उत्तराखंड' विजन के तहत जिलाधिकारी ने सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों को चार प्रमुख दिशा-निर्देश जारी किए हैं:.
- डंपिंग जोन की CCTV से डिजिटल निगरानी: सभी स्थानीय निकाय अपने-अपने क्षेत्रों में कूड़ा उठान (Waste Collection) की व्यवस्था को शत-प्रतिशत प्रभावी बनाएंगे। शहरों में चिन्हित किए गए कूड़ा डंपिंग जोनों पर सीसीटीवी (CCTV) कैमरे लगाए जाएंगे ताकि अवैध रूप से खुले में कूड़ा फेंकने वालों और कचरा न उठाने वाले ठेकेदारों पर डिजिटल नजर रखी जा सके।
- बिंदाल नदी के नालों की आधुनिक सफाई: देहरादून की लाइफलाइन मानी जाने वाली बिंदाल नदी में गिरने वाले सभी प्रदूषित नालों की टैपिंग का कार्य पेयजल निगम को तय समय में पूरा करना होगा। साथ ही, नालों की गाद और कचरा निकालने के लिए आधुनिक रोबोटिक या मैकेनिकल तकनीकों का उपयोग अनिवार्य कर दिया गया है।
- सेलाकुई नगर पंचायत को तत्काल स्लज वाहन: औद्योगिक हब माने जाने वाले नगर पंचायत सेलाकुई में अभी तक एक भी स्लज वाहन (सीवर साफ करने वाली गाड़ी) उपलब्ध न होने पर जिलाधिकारी ने भारी हैरानी और नाराजगी जताई। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे अन्य मदों या अपने विभागीय संसाधनों से तत्काल सेलाकुई के लिए वाहन की व्यवस्था सुनिश्चित करें।
- नदी तटों पर लक्ष्य-आधारित (Target-oriented) सफाई: गंगा, रिस्पना, बिंदाल और अन्य सहायक नदियों के तटों पर केवल रस्मी तौर पर नहीं, बल्कि विशेष 'लक्ष्य-आधारित' स्वच्छता अभियान चलाया जाएगा। इसके लिए सबसे पहले उन हॉटस्पॉट्स (Potential Pollution Sites) की मैपिंग की जाएगी जहां सबसे ज्यादा गंदगी गिरती है, और फिर वहां नियमित सफाई का रोस्टर लागू होगा।
फ्लड ज़ोनिंग चिन्हींकरण का काम पूरा; मानसून से पहले सुरक्षात्मक कदम
नदियों के किनारे होने वाले अवैध निर्माण और बाढ़ के खतरे को रोकने के लिए बैठक में 'फ्लड प्लानिंग जोनिंग' (Flood Plain Zoning) की भी व्यापक समीक्षा की गई। सिंचाई विभाग और संबंधित तकनीकी टीमों द्वारा बैठक में बताया गया कि:
- गंगा नदी का हरिद्वार तक का संपूर्ण फ्लड जोन चिन्हींकरण सफलतापूर्वक कर लिया गया है।
- देहरादून की रिस्पना और आसन नदियों का भी फ्लड ज़ोन मार्किंग का कार्य शत-प्रतिशत पूर्ण हो चुका है।
- इसके अतिरिक्त, जिले की अन्य प्रमुख नदियों जैसे सुसवा, सौंग, जाखन/रानीपोखरी, चन्द्रबागा और यमुना नदी का वैज्ञानिक सर्वे पूरा कर लिया गया है।
जिलाधिकारी ने इस कार्य की सराहना करते हुए निर्देश दिए कि मानसून की दस्तक से पहले और अर्धकुंभ की तैयारियों के मद्देनजर फल्ड जोन चिन्हींकरण की अंतिम वैधानिक रिपोर्ट को समयबद्ध तरीके से नोटिफाई किया जाए, ताकि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के नए निर्माण को रोका जा सके।
अर्धकुंभ मेला 2027: NMCC और SOP के कड़े नियमों के तहत होंगे निर्माण कार्य
वर्ष 2027 में आयोजित होने वाले वैश्विक महत्व के अर्धकुंभ मेले की पूर्व तैयारियों को लेकर जिलाधिकारी ने अभी से खाका खींचना शुरू कर दिया है। ऋषिकेश और उससे सटे क्षेत्रों में अर्धकुंभ के मद्देनजर जो भी नए घाट, सड़कें, पुल, एसटीपी या घाटों का सुंदरीकरण प्रस्तावित है, उनके लिए डीएम ने कड़े गाइडलाइंस जारी किए हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अर्धकुंभ मेला 2027 के तहत होने वाले सभी स्थायी और अस्थायी निर्माण कार्य राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG - National Mission for Clean Ganga) की पूर्व अनुमति और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्धारित की गई सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के दायरे में ही किए जाएंगे। पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाकर किया गया कोई भी निर्माण अमान्य माना जाएगा।
बैठक में उपस्थित रहा शीर्ष प्रशासनिक अमला
ऋषिपर्णा सभागार में देर रात तक चली इस मैराथन बैठक में जिले के विकास और पर्यावरण से जुड़े सभी शीर्ष नीति-निर्माता मौजूद रहे। बैठक में मुख्य रूप से मुख्य विकास अधिकारी (CDO) अभिनव शाह, प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) नीरज शर्मा, नगर निगम ऋषिकेश के नगर आयुक्त गोपाल राम बिनवाल, जिला गंगा संरक्षण समिति के वरिष्ठ सदस्य पंकज गुप्ता तथा जाने-माने पर्यावरणविद् विनोद जुगलान सहित सिंचाई, पेयजल, जल संस्थान, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राजस्व विभाग के सभी वरिष्ठ जिला स्तरीय अधिकारी उपस्थित थे।
देवभूमि की प्रशासनिक कार्यप्रणाली में एक बड़े सुधार का संकेत
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देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान द्वारा जिला गंगा संरक्षण समिति और अर्धकुंभ 2027 की बैठक में अपनाया गया कड़ा रुख यह साबित करता है कि अब उत्तराखंड में सरकारी लेटलतीफी और फाइलों को लटकाए रखने के दिन लद चुके हैं। अमूमन देखा जाता है कि करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत होने के बावजूद विभागीय तालमेल की कमी या म्यूटेशन जैसे छोटे राजस्व मामलों के कारण जनहित की बड़ी योजनाएं सालों-साल अटकी रहती हैं, जैसा कि मसूरी के कैमल बैक और अर्केडिया एसटीपी के मामले में देखने को मिला (जहां 2022 से फाइलें लंबित थीं)।
डीएम द्वारा सीधे संयुक्त मजिस्ट्रेट को मजिस्ट्रेटी जांच सौंपना और 7 दिन के भीतर रिपोर्ट मांगना, लापरवाह अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करना और 'प्रजेंटेशन नहीं, धरातल पर परिणाम' की मांग करना ब्यूरोक्रेसी को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश है। अर्धकुंभ 2027 और गंगा की निर्मलता जैसे राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट्स को यदि समय पर पूरा करना है, तो ऐसे ही 'रिजल्ट-ओरिएंटेड' और सख्त प्रशासनिक नेतृत्व की आवश्यकता है। अब देखना यह होगा कि ७ दिन बाद आने वाली जांच रिपोर्ट के आधार पर ढीले पड़ चुके सिस्टम पर क्या बड़ी दंडात्मक कार्रवाई होती है।