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देहरादून, 03 जून, 2026: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित राज्य के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित सरकारी चिकित्सा संस्थान दून मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय (Doon Medical College & Hospital) में एक बार फिर मरीजों के तीमारदारों और चिकित्सकों के बीच समन्वय व व्यवहार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस बार मामला एक मीडियाकर्मी से जुड़ा होने के कारण प्रशासनिक और सामाजिक गलियारों में तेजी से तूल पकड़ रहा है।
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| अनुपम खत्री (प्रदेश अध्यक्ष), अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति, उत्तराखंड इकाई |
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति (उत्तराखंड) द्वारा जारी एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, दिनांक 02 जून 2026 को संगठन के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने दून अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMO) डॉ. मनोज शर्मा से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने अस्पताल में कार्यरत एक वरिष्ठ चिकित्सक द्वारा पत्रकार प्रवचन सिंह और उनके बीमार पिता के साथ किए गए कथित अभद्र, अपमानजनक और असंवेदनशील व्यवहार के खिलाफ एक औपचारिक शिकायत पत्र (Memorandum) सौंपा। पत्रकारों के शीर्ष संगठन ने अस्पताल प्रशासन से इस पूरे घटनाक्रम की एक निश्चित समयसीमा के भीतर निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्च स्तरीय जांच कराने तथा दोषी पाए जाने पर दंडात्मक कार्रवाई की पुरजोर मांग की है।
01 जून की घटना: छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुराग अग्रवाल के आचरण पर उठे सवाल
शिकायत पत्र और पीड़ित पत्रकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम 01 जून 2026 का है। पत्रकार प्रवचन सिंह अपने वृद्ध एवं अस्वस्थ पिता को गंभीर स्थिति में उपचार दिलाने के लिए दून अस्पताल के छाती रोग विभाग (Pulmonary Medicine Department) पहुंचे थे।
शिकायत पत्र में दर्ज आरोपों का विवरण:
"जब पीड़ित पत्रकार अपने पिता के परामर्श हेतु विभाग के वरिष्ठ छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुराग अग्रवाल के कक्ष में पहुंचे, तो डॉक्टर द्वारा कथित तौर पर उनके साथ बेहद रुखा, अमर्यादित और अपमानजनक व्यवहार किया गया। पीड़ित का आरोप है कि बीमारी की स्थिति पूछने और मानवीय सहयोग का अनुरोध करने पर चिकित्सक ने गरिमा के विपरीत शब्दों का प्रयोग किया। इस कथित आचरण के कारण न केवल मरीज की चिकित्सा प्रभावित हुई, बल्कि गंभीर रूप से बीमार पिता के सामने उनके पुत्र का मानसिक उत्पीड़न किया गया, जिससे पूरे परिवार को गहरा मानसिक आघात पहुंचा है।"
प्रतिनिधिमंडल ने सीएमएस डॉ. मनोज शर्मा और वार्ता के दौरान वहां मौजूद डिप्टी सीएमओ डॉ. दिनेश को अवगत कराया कि दून अस्पताल जैसी बड़ी संस्था में सुदूर क्षेत्रों से आने वाले गरीब मरीजों और उनके परिजनों के साथ इस तरह के दुर्व्यवहार की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं, जिस पर अब लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है।
पत्रकार सुरक्षा समिति बनाम दून अस्पताल प्रशासन: मामले की प्रशासनिक रूपरेखा
इस विवादित प्रकरण से जुड़े प्रशासनिक अधिकारियों, पीड़ित पक्ष के दावों और विधिक मांगों को इस विस्तृत तालिका के माध्यम से पारदर्शी रूप से समझा जा सकता है:
| विवाद एवं प्रशासनिक घटक (Parameters) | संबंधित अधिकारी / पक्षकारों का विवरण (Details) | शिकायतकर्ता संगठन की मुख्य विधिक मांगें (Demands) |
| घटना का मुख्य स्थल (Venue) | छाती रोग विभाग, दून मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, देहरादून। | अस्पताल परिसर के भीतर सुरक्षा और गरिमापूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना। |
| आरोपी चिकित्सक (Accused Doctor) | डॉ. अनुराग अग्रवाल (वरिष्ठ छाती रोग विशेषज्ञ)। | व्यवहारिक आचरण और विभागीय अनुशासन की गहन विधिक जांच। |
| पीड़ित पक्ष (Victim Party) | पत्रकार प्रवचन सिंह एवं उनके अस्वस्थ पिता। | मानसिक उत्पीड़न और इलाज में लापरवाही के दावों पर त्वरित संज्ञान। |
| अस्पताल प्रबंधन (Management) | सीएमएस डॉ. मनोज शर्मा एवं डिप्टी सीएमओ डॉ. दिनेश। | सीसीसीटीवी (CCTV) फुटेज को तत्काल प्रभाव से सुरक्षित करने की मांग। |
| प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व | अनुपम खत्री (प्रदेश अध्यक्ष, ABPSS उत्तराखंड)। | जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक कर पारदर्शी कार्रवाई करने का दबाव। |
"लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं": प्रदेश अध्यक्ष अनुपम खत्री
ज्ञापन सौंपने के बाद मीडियाकर्मियों से वार्ता करते हुए अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के प्रदेश अध्यक्ष अनुपम खत्री ने तीखे शब्दों में अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर रोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पत्रकार कोई विशेषाधिकार नहीं मांग रहे हैं, लेकिन उनके साथ समाज के एक सम्मानित नागरिक जैसा व्यवहार तो मिलना ही चाहिए।
उन्होंने कहा कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा और सबसे मजबूत स्तंभ हैं। वे समाज की कुरीतियों, प्रशासनिक कमियों और जनहित के मुद्दों को उजागर करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर दिन-रात फील्ड में काम करते हैं। जब एक पत्रकार समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा होता है, तो उसके अपने परिवार के लिए समय बहुत सीमित होता है। ऐसे में जब कोई पत्रकार अपने अत्यंत बीमार परिजन या स्वयं के इलाज के लिए सरकारी व्यवस्था पर भरोसा करके अस्पताल पहुंचता है, तो वहां लंबी कतारें, प्रशासनिक शिथिलता और डॉक्टरों का कथित अहंकार उनके सामाजिक दायित्वों को बाधित करता है।
अस्पताल प्रशासन को दो टूक चेतावनी:
श्री खत्री ने अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक के सामने स्पष्ट किया कि डॉक्टरों का काम भगवान का रूप माना जाता है, लेकिन इसकी आड़ में किसी भी चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी द्वारा किसी पत्रकार या आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार, अपमानजनक टिप्पणी या अनावश्यक उत्पीड़न किसी भी स्थिति में स्वीकार्य (Acceptable) नहीं होगा। पत्रकार सम्मान और गरिमा के साथ सुरक्षित माहौल में अपना कार्य और पारिवारिक जिम्मेदारियां निभा सकें, यह सुनिश्चित करना दून अस्पताल प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है।
'प्राथमिकता आधारित उपचार प्रणाली' लागू करने का महत्वपूर्ण सुझाव
प्रेस क्लब और अस्पताल प्रशासन के बीच हुई इस उच्च स्तरीय वार्ता के दौरान समिति के अध्यक्ष अनुपम खत्री ने दून अस्पताल के सुदृढ़ीकरण और डॉक्टरों-पत्रकारों के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक सकारात्मक और व्यावहारिक सुझाव भी रखा।
उन्होंने सीएमएस को सुझाव दिया कि पत्रकारों के कार्य की अत्यधिक व्यस्त और आपातकालीन प्रकृति (Emergency Nature) को देखते हुए सरकारी अस्पतालों में उनके और उनके आश्रितों (माता-पिता, बच्चों) के लिए 'प्राथमिकता आधारित परामर्श एवं उपचार व्यवस्था' (Priority-based OPD & Treatment System) लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। इससे फील्ड में तैनात पत्रकारों का समय बचेगा और वे बिना किसी मानसिक तनाव के अपने सामाजिक और संवैधानिक दायित्वों को पूरा कर सकेंगे। अस्पताल प्रशासन ने इस रचनात्मक सुझाव पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया है।
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति (ABPSS) द्वारा उठाई गई 4 सबसे बड़ी मांगें
पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी शिकायत को पारदर्शी और तार्किक परिणति तक पहुंचाने के लिए मुख्य चिकित्सा अधीक्षक के सम्मुख निम्नलिखित चार कड़े बिंदु रखे हैं:
- CCTV फुटेज को तत्काल सील करना: 01 जून 2026 को छाती रोग विभाग के गलियारों, चिकित्सक के केबिन और ओपीडी क्षेत्र में हुई इस घटना की सच्चाई का पता लगाने के लिए वहां लगे सभी सीसीटीवी (CCTV) कैमरों के फुटेज और डिजिटल अभिलेखों को तत्काल सुरक्षित और सील किया जाए, ताकि उनके साथ कोई तकनीकी छेड़छाड़ न की जा सके।
- समयबद्ध निष्पक्ष जांच कमेटी का गठन: अस्पताल प्रबंधन के निष्पक्ष अधिकारियों की एक आंतरिक जांच समिति (Inquiry Committee) गठित की जाए, जो डॉक्टर और पीड़ित पत्रकार दोनों पक्षों के बयान दर्ज कर अपनी रिपोर्ट सौंपे।
- जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करना: इस मामले की जांच को बंद कमरों तक सीमित न रखकर, जांच रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से सार्वजनिक (Public) किया जाए, जिससे चिकित्सा जगत और मीडिया दोनों के सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
- उच्चाधिकारियों को प्रतिलिपियां प्रेषित: मामले की गंभीरता को देखते हुए इस शिकायत पत्र की आधिकारिक प्रतिलिपियां (Copies) सूबे के स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य सचिव, महानिदेशक (DG Health) और जिलाधिकारी देहरादून को भी आवश्यक कानूनी और प्रशासनिक निगरानी के लिए प्रेषित की जा रही हैं।
प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ पत्रकारों की मुस्तैदी; आंदोलन की रूपरेखा तैयार
दून अस्पताल के प्रशासनिक भवन में आयोजित इस महत्वपूर्ण वार्ता के दौरान पीड़ित पत्रकार प्रवचन सिंह के साथ अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति की पूरी कोर टीम धरातल पर डटी रही। प्रतिनिधिमंडल में मुख्य रूप से संगठन सचिव सुनील राज, वरिष्ठ पत्रकार विनोद बिष्ट, सोनू और ललित श्रीवास्तव सहित दर्जनों स्थानीय मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
समिति के पदाधिकारियों ने साफ किया है कि वर्तमान में वे अस्पताल प्रशासन की आंतरिक जांच प्रक्रिया का सम्मान कर रहे हैं और उन्हें डॉ. मनोज शर्मा की प्रशासनिक क्षमता पर पूरा भरोसा है। परंतु, यदि तय समयसीमा के भीतर इस मामले को दबाने का प्रयास किया गया या आरोपी चिकित्सक को बचाने के लिए तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा गया, तो संगठन पूरे प्रदेश में डॉक्टरों की इस कथित तानाशाही के खिलाफ चरणबद्ध तरीके से उग्र धरना-प्रदर्शन और कार्य बहिष्कार का आंदोलन शुरू करने से पीछे नहीं हटेगा।
चिकित्सा और पत्रकारिता के बीच आपसी सम्मान की आवश्यकता
देहरादून के दून अस्पताल में उपजा यह ताजा विवाद कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि यह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के भारी दबाव और वहां काम करने वाले स्टॉफ के व्यवहारिक दृष्टिकोण के बीच के असंतुलन को दर्शाता है। पत्रकारिता और चिकित्सा, दोनों ही समाज के सबसे संवेदनशील और आवश्यक पेशे हैं। जहाँ एक ओर डॉक्टरों पर अत्यधिक मरीजों को देखने का भारी मानसिक तनाव रहता है, वहीं दूसरी ओर तीमारदारों (विशेषकर पत्रकारों) की अपेक्षाएं भी त्वरित और सम्मानजनक इलाज की होती हैं।
इस पूरे प्रकरण की वास्तविक सच्चाई क्या है, यह तो सीसीटीवी फुटेज की विधिक जांच और मुख्य चिकित्सा अधीक्षक की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। परंतु सुशासन और मानवीय मूल्यों का यह तकाजा है कि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर, जहाँ लोग अत्यंत पीड़ा में आते हैं, प्रत्येक डॉक्टर को अपनी वाणी और व्यवहार में संयम और संवेदनशीलता रखनी चाहिए। अब यह दून अस्पताल प्रशासन की साख का सवाल है कि वह इस मामले की कितनी पारदर्शी जांच कराकर देवभूमि की स्वास्थ्य व्यवस्था और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के बीच के विश्वास को पुनर्स्थापित करता है।
