सतबूंगा (नैनीताल) मामले से उक्रांद ने खोला मोर्चा; लूशुन टोडरिया बोले— 'कथित भू-कानून की खुली पोल, 2000 से अब तक की संदिग्ध भूमि खरीद की हो उच्चस्तरीय जांच'


Aapki Media AI


देहरादून/नैनीताल, 06 अगस्त, 2026: उत्तराखण्ड में मूल निवास और सख्त भू-कानून (Land Laws) को लेकर राजनीतिक और सामाजिक गर्माहट एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गई है। बृहस्पतिवार, 06 अगस्त, 2026 को उत्तराखण्ड क्रांति दल (यूकेडी) के मूल निवास एवं भू-कानून प्रकोष्ठ के केंद्रीय अध्यक्ष लूशुन टोडरिया ने नैनीताल जिले के सतबूंगा क्षेत्र में सामने आए भू-कानून के गंभीर उल्लंघन के मामले को लेकर राज्य सरकार के विधिक दावों पर तीखा प्रहार किया है।


सतबूंगा (नैनीताल) मामले से उक्रांद ने खोला मोर्चा; लूशुन टोडरिया बोले
File Photo: लूशुन टोडरिया 


हाल ही में जिला मजिस्ट्रेट (DM) नैनीताल की विधिक अदालत द्वारा हरियाणा निवासी एक दंपति द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक खरीदी गई भूमि को उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम (UPZALR Act) की धारा-167/154 के तहत 'राज्य सरकार में निहित' (Vested in State Government) करने के पारित आदेश के बाद टोडरिया ने कहा कि यह घटना साबित करती है कि प्रदेश में भू-कानूनों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है और प्रशासनिक सत्यापन प्रणाली (Verification Mechanism) पूरी तरह चरमरा गई है।


यूकेडी अध्यक्ष लूशुन टोडरिया के कड़े नीतिगत सवाल: केवल शिकायत के बाद ही क्यों जागता है तंत्र?



यूकेडी नेता लूशुन टोडरिया ने राज्य सरकार की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु रेखांकित किए:

  1. प्रारंभिक सत्यापन की विफलता: यदि नागरिक या स्थानीय संगठन शिकायत न करें, तो नियमों के विरुद्ध भूमि की खरीद-बिक्री निर्बाध रूप से जारी रहती है। टोडरिया ने सवाल उठाया कि यदि रजिस्ट्री और नामांतरण (Mutation) के समय प्रारंभिक स्तर पर ही राजस्व विभाग द्वारा गहन जांच और क्रेडिबल सत्यापन होता, तो नियमों के विपरीत भूमि क्रय-विक्रय की नौबत ही क्यों आती?
  2. कागजी बनाम व्यावहारिक कानून: राज्य सरकार जिस भू-कानून को 'ऐतिहासिक और प्रभावी' बताकर प्रचारित कर रही है, उसकी धरातलीय सच्चाई सतबूंगा जैसे मामलों से उजागर हो रही है। उत्तराखण्ड की जनता को केवल प्रचार आधारित कानून नहीं, बल्कि ऐसा विधिक ढांचा चाहिए जो मूल निवासियों के अधिकारों की वास्तविक रक्षा करे।
  3. 2000 से अब तक की जांच की मांग: टोडरिया ने मांग की कि 9 नवंबर 2000 (राज्य गठन) से लेकर अब तक गैर-उत्तराखण्ड निवासियों द्वारा कृषि और आवासीय प्रयोजनों के लिए खरीदी गई सभी संदिग्ध भूमियों की एक क्रेडिबल, उच्चस्तरीय और निष्पक्ष न्यायिक जांच (High-Level Judicial Probe) कराई जाए।

 

उत्तराखण्ड के संसाधनों की सुरक्षा: पारदर्शी और कठोर कानून की दरकार


यूकेडी के केंद्रीय अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि उत्तराखण्ड की भूमि, जल, जंगल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा केवल घोषणाओं या राजनीतिक विज्ञापनों से संभव नहीं है। इसके लिए एक कठोर और छिद्र-रहित (Water-tight) विधिक ढांचे की आवश्यकता है।


भू-कानून सुदृढ़ीकरण हेतु 4 मुख्य विधिक सुझाव


  • डिजिटल लैंड रिकॉर्ड्स का रीयल-टाइम ऑटो-सत्यापन: रजिस्ट्री से पूर्व क्रेता के अन्य जनपदों में मौजूद कुल भू-स्वामित्व का एकीकृत पोर्टल के माध्यम से क्रेडिबल ऑटो-वेरिफिकेशन करना।
  • धारा-154/167 का कड़ा क्रियान्वयन: उद्योग, पर्यटन या कृषि के नाम पर ली गई जमीनों का यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर उपयोग न हो, तो उन्हें बिना विलंब राज्य सरकार में निहित करना।
  • मूल निवास-1950 का विधिक क्रियान्वयन: राज्य के संसाधनों पर पहला अधिकार वर्ष 1950 के मूल निवासियों का तय करने हेतु क्रेडिबल नीतिगत ढांचा तैयार करना।
  • पारदर्शी जांच आयोग का गठन: राज्य गठन के बाद से कृषि भूमि के गैर-कृषि प्रयोग और अनुमतियों के दुरुपयोग की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग बनाना।

 

क्रेडिबल सुशासन ही रोकेगा जमीनों का अवैध हस्तांतरण 


06 अगस्त, 2026 को यूकेडी नेता लूशुन टोडरिया द्वारा नैनीताल के सतबूंगा प्रकरण के माध्यम से उठाया गया मुद्दा उत्तराखण्ड के भविष्य से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील प्रशासनिक और विधिक विषय है। जिलाधिकारी नैनीताल की अदालत द्वारा भूमि को राज्य सरकार में निहित करने का आदेश यह तो सिद्ध करता है कि कानून में कार्रवाई के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि अवैध क्रय-विक्रय के इन मामलों को शुरुआती स्तर पर रोकने में राजस्व तंत्र असफल क्यों हो रहा है।


राज्य के जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के लिए केवल कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक पारदर्शी, जवाबदेह और डिजिटल सत्यापन प्रणाली का होना अनिवार्य है। यदि राज्य सरकार इस प्रकार के मामलों से सबक लेते हुए राज्य गठन के बाद से हुई संदिग्ध भूमि खरीदों की निष्पक्ष जांच कराती है और भू-कानून के सुराखों (Loop-holes) को बंद करती है, तभी उत्तराखण्ड के मूल निवासियों के अधिकारों और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की क्रेडिबल रक्षा संभव हो सकेगी। 

स्रोत: उत्तराखण्ड क्रांति दल (UKD) केंद्रीय अध्यक्ष लूशुन टोडरिया प्रेस विज्ञप्ति




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Krishna Kumar
लेखक के बारे में

कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 6+ साल पहले 'आपकी मीडिया' जैसे बहुआयामी संस्थान... और पढ़ें
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