बेतालघाट (नैनीताल): उत्तराखंड के पहाड़ों में खेती को आजीविका का मुख्य आधार माना जाता है, लेकिन नैनीताल जिले का कटीमी गजार (बेतालघाट) गांव आज पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा है। यहाँ के मेहनतकश किसान अपनी उपजाऊ भूमि को बंजर होते देख खून के आंसू रोने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से लेकर सिंचाई विभाग तक गुहार लगाने के बावजूद शासन-प्रशासन की नींद नहीं टूट रही है, जिससे अब ग्रामीण गाँव छोड़कर पलायन करने का मन बना रहे हैं।
किसान प्रेम महाराज की 'हड्डी तोड़' मेहनत भी फेल
गांव के एक प्रगतिशील किसान और पूर्व प्रधान प्रतिनिधि प्रेम महाराज की कहानी क्षेत्र के हर किसान की व्यथा बयां करती है। प्रेम महाराज ने बिना किसी सरकारी मदद के अपने हाथों से गड्ढा खोदकर और पंप लगाकर खेती को सींचने का प्रयास किया। वे गेहूं, प्याज और लहसुन की बड़े पैमाने पर खेती कर रहे थे। लेकिन अब जल स्रोत (Source) पूरी तरह सूख चुके हैं।
प्रेम महाराज भावुक होकर कहते हैं— "हमने हड्डी तोड़ मेहनत की, कई बार सीएम पोर्टल (1905) और अखबारों के माध्यम से एक नलकूप (Tubewell) की मांग की, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। अब पानी नहीं है, तो हमें मजबूरी में अपनी जमीन छोड़कर पलायन करना पड़ेगा।"
कटीमी गजार: सिंचाई संकट का रिपोर्ट कार्ड
| मुख्य बिंदु | विवरण |
| प्रभावित क्षेत्र | ग्राम कटीमी गजार, ब्लॉक बेतालघाट (नैनीताल) |
| खेती योग्य भूमि | लगभग 200 नाली (जो अब बंजर हो रही है) |
| मुख्य फसलें | गेहूं, प्याज, लहसुन और मौसमी सब्जियां |
| ग्रामीणों की मांग | गांव में एक सरकारी नलकूप (Tubewell/Summersible) की स्थापना |
| शिकायत का माध्यम | मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1905 और सिंचाई विभाग |
200 नाली उपजाऊ जमीन हो रही बंजर
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में 200 नाली से अधिक उपजाऊ जमीन है। अगर यहाँ एक सरकारी समरसेबल या नलकूप लग जाए, तो पूरे गांव की आजीविका पटरी पर लौट सकती है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने भी मौके पर स्थिति का जायजा लेकर यह स्वीकार किया है कि यहाँ नलकूप की सख्त जरूरत है, लेकिन फाइलों में दबी योजना धरातल पर नहीं उतर पा रही है।
इन ग्रामीणों ने बुलंद की आवाज (मुख्य नाम)
नलकूप की मांग को लेकर एकजुट हुए ग्रामीणों में बिलोक नेगी, कृपाल नाथ, भोलानाथ, पदमा देवी, जगदीश नाथ, गोपाल नाथ, केसर सिंह रावत, कमला देवी सहित दर्जनों किसान शामिल हैं। इन सभी का एक ही कहना है कि यदि सरकार ने जल्द कदम नहीं उठाए, तो कटीमी गांव भी उत्तराखंड के उन 'भूतिया गांवों' (Ghost Villages) की सूची में शामिल हो जाएगा, जहाँ से लोग पानी के अभाव में पलायन कर चुके हैं।
प्रशासनिक अनदेखी और पलायन का खतरा (मुख्य बिंदु)
- अनसुनी गुहार: सीएम हेल्पलाइन 1905 पर कई बार शिकायत दर्ज करने के बाद भी केवल आश्वासन ही मिला।
- सूखते जल स्रोत: प्राकृतिक गधेरे और स्रोत सूखने से अब व्यक्तिगत पंप भी जवाब दे गए हैं।
- आजीविका पर संकट: खेती ही यहाँ के लोगों की आय का एकमात्र साधन है, जिसके रुकने से भुखमरी की नौबत आ गई है।
- मीडिया से उम्मीद: ग्रामीणों को उम्मीद है कि मीडिया के माध्यम से उनकी आवाज सरकार के कानों तक पहुँचेगी और उनके खेतों को पानी मिलेगा।
क्या 'खेलभूमि' के साथ 'कृषिभूमि' भी बचेगी?
एक ओर सरकार उत्तराखंड को 'खेलभूमि' और 'पर्यटन हब' बनाने के लिए करोड़ों का बजट पास कर रही है, वहीं दूसरी ओर बेतालघाट के ये किसान एक नलकूप के लिए तरस रहे हैं। कटीमी गजार की बंजर होती जमीन और पलायन को तैयार परिवार शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
नोट: यह न्यूज़ रिपोर्ट स्थानीय किसानों और ग्रामीणों द्वारा दी गई जानकारी और उनकी वास्तविक समस्याओं पर आधारित है।
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