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कोचिंग के जाल में फंसा बचपन: बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष गीता खन्ना ने उठाए सवाल; "सब कुछ कोचिंग में ही सीखना है तो स्कूल की क्या भूमिका?"

देहरादून, 20 मार्च 2026: राजधानी देहरादून सहित पूरे प्रदेश में कोचिंग संस्थानों की बाढ़ और बच्चों पर बढ़ते शैक्षणिक दबाव को लेकर उत्तराखंड बाल संरक्षण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग की अध्यक्ष गीता खन्ना ने कोचिंग संस्थानों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए एक बड़ी चुनौती बताया है।


"स्कूल केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, संस्कार की पाठशाला हैं"

गीता खन्ना ने कोचिंग संस्कृति पर प्रहार करते हुए कहा कि आज बच्चों को केवल 'रटंत शिक्षा' की ओर धकेला जा रहा है। उन्होंने विद्यालयों की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा:

  • सामाजिक विकास: स्कूल बच्चों को टीम वर्क, सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक संस्कार सिखाते हैं।
  • जीवन कौशल: विद्यालय में बच्चा जीवन की चुनौतियों से लड़ना सीखता है, जो कोचिंग के बंद कमरों में मुमकिन नहीं है।
  • कोचिंग का बोझ: अगर बच्चा दिन का बड़ा हिस्सा कोचिंग में बिता रहा है, तो स्कूल की भूमिका महज एक डिग्री देने वाले केंद्र तक सिमट कर रह गई है।

कोचिंग संस्थानों पर उठते गंभीर सवाल

मुद्दागीता खन्ना द्वारा उठाई गई चिंता
नियामक व्यवस्थाकोचिंग संस्थानों पर किसी प्रकार का सख्त सरकारी नियंत्रण या गाइडलाइन नहीं है।
सुरक्षा व सुविधाएंस्कूलों के लिए कड़े मानक हैं, लेकिन कई कोचिंग संस्थान असुरक्षित भवनों और बिना सुविधाओं के चल रहे हैं।
भ्रामक विज्ञापनअभिभावकों को बड़े-बड़े दावों और विज्ञापनों के जरिए गुमराह किया जा रहा है।
निजी समय का अभावस्कूल, फिर कोचिंग और अंत में होमवर्क के कारण बच्चों के पास खेलने या परिवार के साथ बैठने का समय नहीं बचा।

बचपन की आजादी पर 'कोचिंग' का पहरा

अध्यक्ष ने चिंता जताई कि आज का बच्चा तनाव (Stress) के साये में जी रहा है। सुबह स्कूल और दोपहर से रात तक कोचिंग में रहने के कारण बच्चों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि बच्चों को आराम, खेल-कूद और अपनों के साथ समय बिताने की सख्त जरूरत है, जो इस भागदौड़ भरी शिक्षा पद्धति में गायब होता जा रहा है।

सख्त नियमन की आवश्यकता

गीता खन्ना ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि कोचिंग संस्थानों के लिए भी स्कूलों और हॉस्टल्स की तर्ज पर स्पष्ट मानक और नियम तय किए जाएं। उन्होंने अभिभावकों से भी अपील की है कि वे केवल विज्ञापनों के पीछे न भागें और अपने बच्चों की मानसिक स्थिति को समझें।

शिक्षा के बाजारीकरण पर लगाम जरूरी

बाल संरक्षण आयोग का यह बयान शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ एक बड़ी चेतावनी है। यदि समय रहते इन संस्थानों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो आने वाली पीढ़ी केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रह जाएगी और उनका सामाजिक व नैतिक विकास पूरी तरह अवरुद्ध हो जाएगा।

 नोट: यह रिपोर्ट बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष गीता खन्ना द्वारा दिए गए आधिकारिक बयान और प्रेस बाइट पर आधारित है।

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