सोनम वांगचुक की रिहाई: लद्दाख के 'आधुनिक गांधी' की जेल से वापसी; एक नजर उनके संघर्ष, नवाचार और 'प्रण से प्राण तक' के सफर पर


Aapki Media AI


नई दिल्ली/लेह, 14 मार्च 2026: केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए लद्दाख के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक को तत्काल प्रभाव से रिहा करने का निर्णय लिया है। वांगचुक, जो पिछले कई महीनों से राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में थे, अब अपने क्षेत्र लद्दाख लौट सकेंगे। सरकार के इस फैसले को लद्दाख में जारी तनाव को कम करने और सार्थक संवाद शुरू करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है।

रिहाई का आधिकारिक आधार: शांति की ओर कदम

शनिवार को जारी एक आधिकारिक बयान में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत वांगचुक की हिरासत को रद्द कर दिया गया है।

  • हिरासत की अवधि: वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को लद्दाख में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दो दिन बाद हिरासत में लिया गया था।
  • सरकार का तर्क: गृह मंत्रालय के अनुसार, सरकार लद्दाख के हितधारकों और नेताओं के साथ रचनात्मक संवाद स्थापित करना चाहती है। शांति और आपसी विश्वास का वातावरण बनाने के लिए उनकी रिहाई को आवश्यक माना गया है।

क्यों आंदोलन कर रहे हैं सोनम वांगचुक? (मुख्य मांगें)

सोनम वांगचुक का संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे लद्दाख की क्षेत्रीय पहचान और पर्यावरण की रक्षा से जुड़ा है। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

  1. छठी अनुसूची (Sixth Schedule): लद्दाख के जनजातीय हितों, भूमि और संसाधनों की रक्षा के लिए इसे संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना।
  2. पूर्ण राज्य का दर्जा: लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश से बदलकर एक पूर्ण स्वायत्त राज्य बनाना।
  3. पर्यावरण संरक्षण: हिमालयी ग्लेशियरों को औद्योगिक दोहन से बचाना।
  4. संसदीय प्रतिनिधित्व: लद्दाख के लिए लोकसभा की दो सीटों की मांग।

संघर्ष का घटनाक्रम: अनशन से हिंसा तक

तिथिघटनापरिणाम
अगस्त 2019अनुच्छेद 370 का खात्मालद्दाख अलग UT बना, जनता ने स्वागत किया।
मार्च 202421 दिवसीय भूख हड़ताललद्दाख की मांगों पर वैश्विक ध्यान आकर्षित हुआ।
अक्टूबर 2024दिल्ली पैदल मार्चसिंघु बॉर्डर पर हिरासत में लिए गए।
सितंबर 202535 दिवसीय अनशन24 सितंबर को लेह में हिंसा भड़की (4 मौतें, 50 घायल)।
26 सित. 2025गिरफ्तारीवांगचुक पर NSA लगाया गया और जेल भेजा गया।
14 मार्च 2026रिहाईकेंद्र सरकार ने हिरासत रद्द की।

शून्य से शिखर तक: कौन हैं सोनम वांगचुक?

सोनम वांगचुक की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 59 वर्षीय वांगचुक का जन्म 1966 में लेह के एक दुर्गम गांव उलेटोक्पो में हुआ था। उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलू:

1. 9 साल की उम्र तक नहीं देखा स्कूल

वांगचुक ने नौ साल की उम्र तक औपचारिक स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। उनकी मां ने उन्हें घर पर ही स्थानीय भाषा और अनुभवों के माध्यम से पढ़ाया। वांगचुक का मानना है कि इसी 'देरी' ने उन्हें लीक से हटकर सोचने की शक्ति दी।

2. श्रीनगर से दिल्ली तक का संघर्ष

श्रीनगर के स्कूल में जब उन्हें भाषा की समस्या के कारण प्रताड़ित किया गया, तो 12 साल की उम्र में वे अकेले बस से दिल्ली भाग आए। उनके साहस को देखकर दिल्ली के विशेष केंद्रीय विद्यालय के प्रिंसिपल ने उन्हें तुरंत दाखिला दे दिया।

3. पिता से बगावत और कोचिंग सेंटर

इंजीनियरिंग के दौरान उनके पिता (जो जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री थे) चाहते थे कि वे सिविल इंजीनियरिंग करें, लेकिन सोनम को मैकेनिकल इंजीनियरिंग और ऑप्टिक्स पसंद थी। पिता ने खर्चा बंद किया, तो 19 साल की उम्र में उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पूरी इंजीनियरिंग की फीस खुद जमा की।

नवाचार और शिक्षा में क्रांति: सेकमोल (SECMOL)

साल 1988 में उन्होंने Students Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) की शुरुआत की। यह कोई साधारण स्कूल नहीं था, बल्कि उन बच्चों के लिए एक 'आशा की किरण' थी जिन्हें पारंपरिक शिक्षा पद्धति ने 'फेल' करार दे दिया था।

  • ऑपरेशन न्यू हॉप (1994): इस पहल ने लद्दाख के सरकारी स्कूलों में पास होने की दर को 5% से बढ़ाकर 75% कर दिया।
  • आइस स्तूप (Ice Stupa): पानी की कमी से निपटने के लिए कृत्रिम ग्लेशियर बनाने की तकनीक।
  • सौर ऊर्जा चालित कैंप: भारतीय सेना के लिए चीन सीमा पर ऐसे टेंट और कैंप बनाए जो बिना ईंधन के भी अंदर से गर्म रहते हैं।

पुरस्कार और सम्मान

उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें साल 2018 में एशिया के नोबेल कहे जाने वाले 'रेमन मैग्सेसे पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध फिल्म 'थ्री इडियट्स' का किरदार 'रेंचो' (रैंचोड़दास चांचड़) भी उनके जीवन से प्रेरित माना जाता है, हालांकि वांगचुक विनम्रतापूर्वक इसे केवल एक संयोग या आंशिक प्रेरणा बताते हैं।

सोनम वांगचुक की रिहाई लद्दाख के आंदोलन के लिए एक नई शुरुआत हो सकती है। सरकार द्वारा "सार्थक संवाद" की बात कहना यह संकेत देता है कि लद्दाख की मांगों पर अब मेज पर बैठकर चर्चा होगी। हालांकि, वांगचुक के समर्थकों का कहना है कि जब तक छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता, वैचारिक संघर्ष जारी रहेगा।




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Krishna Kumar
लेखक के बारे में

कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 6+ साल पहले 'आपकी मीडिया' जैसे बहुआयामी संस्थान... और पढ़ें
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