देहरादून, 03 अप्रैल 2026: उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और कथा साहित्य को शेष दुनिया से जोड़ने के लिए एक मील का पत्थर स्थापित हुआ है। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में साहित्यकार कान्ता घिल्डियाल द्वारा अनूदित पुस्तक 'पनाळ' का भव्य लोकार्पण किया गया। यह पुस्तक गढ़वाली कथा साहित्य के इतिहास में पहली ऐसी कृति है, जिसमें चुनिंदा मौलिक गढ़वाली कहानियों का हिंदी में अनुवाद किया गया है।
वरिष्ठ कवि राजेश सकलानी की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने 'पनाळ' को गढ़वाल के समाज, सुख-दुख और जीवन सरोकारों को वैश्विक मंच प्रदान करने वाला माध्यम बताया।
'पनाळ' पुस्तक लोकार्पण: एक नजर में (Event Highlights)
| मुख्य विवरण | कार्यक्रम और पुस्तक से जुड़ी जानकारी |
| पुस्तक का नाम | पनाळ (गढ़वाली कहानियों का हिंदी अनुवाद) |
| अनुवादक/चयन | कान्ता घिल्डियाल |
| मुख्य अतिथि/वक्ता | मदन मोहन डुकलाण, गणेश खुगशाल 'गणी', कर्नल मदन मोहन कण्डवाल |
| कार्यक्रम की अध्यक्षता | राजेश सकलानी (कवि एवं समालोचक) |
| संचालन | बीना बेंजवाल (कवयित्री) |
| आयोजन स्थल | दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, देहरादून |
पर्वतीय समाज की व्यथा अब हिंदी के बड़े फलक पर: मुख्य बिंदु
- पहली बार हिंदी अनुवाद की मिसाल: कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजेश सकलानी ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र की कहानियों के हिंदी अनुवाद की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। 'पनाळ' इस कमी को पूरा करने वाली पहली पुस्तक है, जो साहित्य जगत में एक मिसाल के रूप में दोहराई जाएगी।
- मूर्धन्य लेखकों का संगम: इस कथा संग्रह में सदानंद कुकरेती, विद्यावती डोभाल, रमा प्रसाद धिल्डियाल ‘पहाड़ी’, डाॅ. महावीर प्रसाद गैरोला, और गिरधारी लाल थपलियाल ‘कंकाल’ जैसे कालजयी लेखकों से लेकर आधुनिक कथाकारों तक की कहानियों को शामिल किया गया है।
- गढ़वाल के सुख-दुख की गूंज: गढ़वाल विश्वविद्यालय के निदेशक गणेश खुगशाल 'गणी' ने कहा कि हिंदी में अनुवाद होने से इन कहानियों की पहुंच अब बहुत बड़े पाठक वर्ग तक हो गई है। इससे गढ़वाल के समाज की व्यथा-कथा और संघर्षों को शेष दुनिया बेहतर ढंग से समझ पाएगी।
- अनुवादक का साहसिक प्रयास: वक्ताओं ने कान्ता घिल्डियाल के इस श्रमसाध्य कार्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि अनुवाद केवल शब्दों का नहीं बल्कि संस्कृति का होता है, और 'पनाळ' में गढ़वाली परिवेश की सुगंध को हिंदी में बखूबी उतारा गया है।
- प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति: समारोह में डॉ. डी. आर. पुरोहित, प्रेम साहिल, कमला पंत, और विजय पाहवा सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोध छात्र और भाषाविद् उपस्थित रहे। दून पुस्तकालय के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने सभी अतिथियों का परिचय कराया।
- सांस्कृतिक सेतु: 'पनाळ' केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि गढ़वाली और हिंदी भाषा के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य करेगी, जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में सहायक होगी।
लोक साहित्य का नया सवेरा
'पनाळ' का प्रकाशन इस बात का प्रतीक है कि क्षेत्रीय बोलियों का साहित्य अब अपनी सीमाओं को लांघकर राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए तैयार है। यह पुस्तक न केवल पाठकों के लिए एक उपहार है, बल्कि उन शोधार्थियों के लिए भी अनमोल धरोहर है जो उत्तराखंड के समाज का अध्ययन करना चाहते हैं।
