देहरादून | 20 अप्रैल, 2026 : उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में एक बार फिर चुनावी हलचल तेज होने वाली है। प्रदेश में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और वार्ड सदस्यों के रिक्त पड़े पदों को भरने के लिए पंचायती राज विभाग ने कमर कस ली है। विभाग ने उपचुनाव कराने का औपचारिक प्रस्ताव राज्य निर्वाचन आयोग को भेज दिया है, जिससे उम्मीद जगी है कि मई महीने में चुनाव की अधिसूचना जारी हो सकती है।
3000 पदों पर होगा मुकाबला: वार्ड मेंबर्स की संख्या सबसे अधिक
जानकारी के अनुसार, प्रदेश भर में विभिन्न कारणों से करीब 3000 पद खाली पड़े हैं। इन रिक्तियों का विवरण इस प्रकार है:
- वार्ड सदस्य: सबसे बड़ी संख्या (लगभग 3000 के करीब) वार्ड सदस्यों की है।
- ग्राम प्रधान: 02 पद रिक्त हैं।
- क्षेत्र पंचायत सदस्य (BDC): 01 पद रिक्त है।
पंचायती राज विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते ने बताया कि जिन पंचायतों में पद रिक्त थे, उनकी सूची तैयार कर आयोग को भेज दी गई है। अब गेंद राज्य निर्वाचन आयोग के पाले में है।
मई में अधिसूचना और जून में मतदान की उम्मीद
राज्य निर्वाचन आयोग फिलहाल पंचायती राज विभाग के प्रस्ताव का अध्ययन कर रहा है। निर्वाचन आयुक्त सुशील कुमार के अनुसार, आरक्षण के समुचित निर्धारण और अन्य औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद चुनाव की तारीखों का ऐलान किया जाएगा।
- अधिसूचना: मई 2026 में जारी होने की प्रबल संभावना।
- मतदान प्रक्रिया: जून 2026 तक पूरी की जा सकती है।
क्यों जरूरी है यह उपचुनाव?
स्थानीय शासन व्यवस्था में वार्ड सदस्य और ग्राम प्रधान 'रीढ़' की हड्डी माने जाते हैं। इन पदों के खाली रहने से ग्रामीण स्तर पर कई समस्याएं आ रही थीं:
- विकास कार्यों में बाधा: जनप्रतिनिधियों के अभाव में कई विकास योजनाएं और निर्माण कार्य लटके हुए हैं।
- सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन: केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को धरातल पर उतारने में देरी हो रही है।
- निर्णय लेने में कठिनाई: कोरम पूरा न होने या प्रधान न होने से स्थानीय स्तर पर नीतिगत निर्णय प्रभावित हो रहे हैं।
आरक्षण निर्धारण पर टिकी नजरें
राज्य निर्वाचन आयोग ने सरकार को आरक्षण की स्थिति स्पष्ट करने के लिए पत्र लिखा है। आरक्षण का सही निर्धारण होने के बाद ही चुनाव की पारदर्शी प्रक्रिया शुरू होगी। आयोग वर्तमान में मतदाता सूची के सत्यापन और मतदान केंद्रों की तैयारी में जुटा है।
इन उपचुनावों से न केवल रिक्त पद भरे जाएंगे, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र भी मजबूत होगा। गांवों में संभावित उम्मीदवारों ने अभी से अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं, जिससे आने वाले दिनों में उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक पारा चढ़ना तय है।
