डीएम सविन बंसल; कैंसर पीड़ित विधवा सुनीता को ₹50 हजार की मदद, बच्चों का स्कूल में कराया दाखिला


Aapki Media AI


देहरादून, 23 मई, 2026: कहते हैं कि जब इंसान की किस्मत रूठ जाती है और चारों तरफ से मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, तब एक संवेदनशील प्रशासनिक हाथ उसे बिखरने से बचा सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कुशल मार्गदर्शन और जिलाधिकारी (DM) सविन बंसल के संवेदनशील नेतृत्व में देहरादून जिला प्रशासन इस समय ठीक यही भूमिका निभा रहा है। सरकारी फाइलें और प्रशासनिक प्रोटोकॉल से परे हटकर, देहरादून जिला प्रशासन इस समय जनपद के जरूरतमंद, असहाय और समाज के सबसे वंचित परिवारों की तकदीर और तस्वीर बदलने में पूरी निष्ठा के साथ जुटा हुआ है।

डीएम सविन बंसल; कैंसर पीड़ित विधवा सुनीता को ₹50 हजार की मदद, बच्चों का स्कूल में कराया दाखिला

इसी मानवीय और जन-कल्याणकारी कार्यशैली की एक बेहद भावुक कर देने वाली मिसाल उस समय सामने आई, जब डोईवाला की रहने वाली एक बेसहारा, विधवा और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रही महिला सुनीता कलवार की गुहार पर जिलाधिकारी सविन बंसल ने तत्काल एक्शन लेते हुए पूरे परिवार का जीवन संवारने का जिम्मा उठा लिया। प्रशासन ने न केवल पीड़ित महिला को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई, बल्कि पैसों की तंगी के कारण घर पर बैठने को मजबूर हो चुके उसके दोनों बच्चों के भविष्य को भी अंधकार से बाहर निकाल लिया।

पीड़ा और संघर्ष की दास्तान: इलाज कराएं या बच्चों को पढ़ाएं?

डोईवाला की निवासी सुनीता कलवार एक एकल (विधवा) महिला हैं, जिनके कंधों पर अपने दो मासूम बच्चों के लालन-पालन की पूरी जिम्मेदारी है। विडंबना यह रही कि पति के साए के उठ जाने के बाद सुनीता खुद कैंसर जैसी अत्यंत गंभीर और खर्चीली बीमारी की चपेट में आ गईं।

  • अस्पताल और ऑपरेशन: उनका 11 जुलाई 2024 को जौलीग्रांट स्थित हिमालयन अस्पताल में कैंसर का एक बड़ा ऑपरेशन हुआ था।
  • आर्थिक संकट: वर्तमान में भी उनका कीमोथेरेपी और अन्य उपचार निरंतर जारी है।

लगातार महंगे इलाज और दवाइयों के खर्च ने परिवार की आर्थिक कमर पूरी तरह तोड़ दी थी। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि सुनीता के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा था कि वे जीवित रहने के लिए अपना इलाज कराएं या फिर बच्चों का पेट भरकर उन्हें स्कूल भेजें। आर्थिक लाचारी के कारण उनके बच्चों की शिक्षा पूरी तरह बाधित हो चुकी थी और स्कूलों से नाम कटने की नौबत आ गई थी। जब कोई रास्ता नहीं सूझा, तो सुनीता कलवार ने बेहद व्यथित मन से जिलाधिकारी सविन बंसल के समक्ष उपस्थित होकर रोते हुए अपनी यह मर्मस्पर्शी व्यथा साझा की और बच्चों की फीस माफी व इलाज के लिए गुहार लगाई।

कैंसर पीड़ित सुनीता कलवार के परिवार को मिली प्रशासनिक सहायता का विवरण

 

समस्या का क्षेत्र (Issue)पीड़ित परिवार की पूर्व स्थितिडीएम सविन बंसल द्वारा किया गया त्वरित समाधानआवंटित फंड / योजना का नाम
इलाज व तात्कालिक आर्थिकीकैंसर के ऑपरेशन के बाद दवाइयों के लिए पैसों का घोर संकट।₹50,000 की नकद आर्थिक सहायता तत्काल स्वीकृत कर प्रदान की गई।रायफल क्लब फंड (Rifle Club Fund), देहरादून।
पुत्र की शिक्षा (Son's Education)आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छूटने के कगार पर थी।जिलाधिकारी के हस्तक्षेप से प्रतिष्ठित विद्यालय में निःशुल्क दाखिला सुनिश्चित।जिला शिक्षा विभाग, देहरादून।
पुत्री की पढ़ाई (Girl Child Education)स्कूल की फीस न भर पाने के कारण शिक्षा बाधित हो चुकी थी।बाधित पढ़ाई को पुनः प्रारंभ करवाकर मुख्यधारा से जोड़ा गया।'प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा' (Project Nanda-Sunanda)।

डीएम का त्वरित एक्शन: 'रायफल क्लब फंड' से ₹50,000 स्वीकृत; बच्चों की पढ़ाई की ली जिम्मेदारी

प्रकरण की गंभीरता, संवेदनशीलता और एक मां की लाचारी को देखते हुए जिलाधिकारी सविन बंसल का दिल पसीज गया। उन्होंने बिना एक पल की देरी किए संबंधित अधिकारियों को तत्काल राहत पहुंचाने के कड़े निर्देश जारी किए:

  • तात्कालिक राहत: जिलाधिकारी के विशेष विवेकधीन अधिकारों के अंतर्गत संचालित होने वाले रायफल क्लब फंड से विधवा सुनीता कलवार को 50,000 रुपये की वित्तीय सहायता तत्काल मंजूर कर उनके सुपुर्द की गई, ताकि उनकी दवाइयों और घर के राशन का संकट दूर हो सके।
  • पुत्र का स्कूल में दाखिला: डीएम के कड़े रुख के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने तत्काल सुनीता के पुत्र का दाखिला सुव्यवस्थित तरीके से विद्यालय में संपन्न कराया और उसकी स्कूल ड्रेस व कॉपियों की व्यवस्था की।
  • 'प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा' से बेटी को नई जिंदगी: सुनीता की बेटी, जो पैसों के अभाव में स्कूल छोड़ चुकी थी, उसकी बाधित शिक्षा को जिला प्रशासन की सबसे महत्वाकांक्षी और फ्लैगशिप पहल 'प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा' के तहत कवर किया गया। इस योजना के माध्यम से अब उस बेटी की आगे की पढ़ाई का पूरा खर्च और जिम्मेदारी प्रशासन उठाएगा।

क्या है जिला प्रशासन का 'प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा'?

देहरादून जिला प्रशासन द्वारा विशेष रूप से शुरू किया गया 'प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा' आज जिले की सैकड़ों असहाय बेटियों के लिए वरदान साबित हो रहा है। इसके मुख्य उद्देश्य और कार्यप्रणाली निम्नलिखित हैं:

  • बाधित शिक्षा को पुनर्जीवित करना: ऐसी बालिकाएं जिन्होंने आर्थिक तंगी, माता-पिता की मृत्यु, या किसी पारिवारिक संकट के कारण बीच में ही स्कूल छोड़ दिया था (Drop-outs), उन्हें ढूंढकर दोबारा स्कूलों में दाखिल कराना।
  • वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा: इस प्रोजेक्ट के तहत आने वाली बालिकाओं की ट्यूशन फीस, किताबों, और यूनीफॉर्म का प्रबंध जिला प्रशासन विभिन्न कल्याणकारी कोषों और स्वयंसेवी संस्थाओं के समन्वय से करता है।
  • बाल विवाह और शोषण पर रोक: जब गरीब बेटियों को प्रशासन की तरफ से शिक्षा का संबल मिलता है, तो समाज में बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगती है और वे आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर होती हैं।
  • हजारों बेटियों को मिला सहारा: केवल सुनीता की बेटी ही नहीं, बल्कि विगत कुछ महीनों के भीतर ही इस अनूठी योजना के माध्यम से देहरादून जनपद की सैकड़ों असहाय बालिकाओं को पुनः मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा चुका है।

प्रशासन की व्यापक मानवीय एप्रोच: उपचार से लेकर ऋण राहत तक सैकड़ों मामलों का निपटारा

सुनीता कलवार का मामला तो महज़ एक बानगी है। जिलाधिकारी सविन बंसल के कमान संभालने के बाद से देहरादून जिला प्रशासन ने अपनी एक अलग 'ह्यूमन एप्रोच' (मानवीय दृष्टिकोण) विकसित की है। कलेक्ट्रेट में आने वाली जनता को अब केवल तारीखें नहीं मिलतीं, बल्कि उनके संकट का तुरंत समाधान किया जाता है।
विगत वर्षों और महीनों में जिला प्रशासन द्वारा जनहित में निम्नलिखित अभूतपूर्व कार्य किए गए हैं:

  1. लाखों की आर्थिक सहायता: गंभीर बीमारियों (जैसे किडनी फेल्योर, लिवर ट्रांसप्लांट, हार्ट सर्जरी) से पीड़ित जरूरतमंदों को मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष और रायफल क्लब फंड से लाखों रुपये की तत्काल मदद पहुंचाई गई है।
  2. विद्युत व जल बकाया राहत: अत्यंत गरीब और बेसहारा परिवारों, जो बिजली और पानी का भारी-भरकम बिल चुकाने में असमर्थ थे, उनके मामलों का मानवीय आधार पर निस्तारण कर राहत दी गई।
  3. बैंक ऋण और कुर्की से राहत: आर्थिक मंदी या दुर्घटना के कारण जो गरीब लोग छोटे बैंक लोन नहीं चुका पा रहे थे और उनकी संपत्तियों की कुर्की की नौबत थी, उन्हें वैधानिक दायरे में रहते हुए बैंक राहत और ऋण माफी/समझौते की सुविधाएं प्रदान की गईं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का विजन: "अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे सरकार"

जिलाधिकारी सविन बंसल ने इस अवसर पर कहा कि जिला प्रशासन की यह पूरी कार्यप्रणाली माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के उस विजन का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने 'सरलीकरण, समाधान और निस्तीकरण' का मूल मंत्र दिया है।

प्रशासन का उद्देश्य केवल दफ्तर में बैठकर फाइलें पास करना नहीं है, बल्कि ग्राउंड जीरो पर जाकर यह देखना है कि क्या सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े उस व्यक्ति को मिल रहा है जिसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। सुनीता कलवार जैसे संकटग्रस्त परिवारों को जब सरकार और प्रशासन से सीधा भरोसा मिलता है, तो पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति आम जनमानस का सम्मान और विश्वास कई गुना बढ़ जाता है।

एक माँ की आँखों के आँसू पोछकर प्रशासन ने पेश की 'सुशासन' की परिभाषा

कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ रही एक विधवा मां के लिए अपने बच्चों की छूटती हुई पढ़ाई को अपनी आंखों के सामने देखना किसी जीते जी मरने जैसा ही था। लेकिन देहरादून जिला प्रशासन ने जिस तत्परता और संवेदनशीलता के साथ सुनीता की व्यथा को सुना और चंद घंटों के भीतर ₹50,000 की नकद राशि के साथ दोनों बच्चों के स्कूल का प्रबंध किया, वह आधुनिक सुशासन (Good Governance) का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

'प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा' के जरिए एक बेटी की शिक्षा को पुनर्जीवित करना और बेटे को स्कूल भेजना यह साबित करता है कि जिलाधिकारी सविन बंसल के नेतृत्व में देहरादून का प्रशासनिक अमला आज एक अभिभावक की तरह जनता के साथ खड़ा है। यह संवेदनशीलता देवभूमि की प्रशासनिक व्यवस्था को देश के अन्य राज्यों के लिए एक अनुकरणीय रोल मॉडल बनाती है।




📢 खबरों को सबसे पहले पाने के लिए आपकी मीडिया को फॉलो करें
👉 WhatsApp Channel Join करें 👉 WhatsApp Group Join करें
Krishna Kumar
लेखक के बारे में

कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 6+ साल पहले 'आपकी मीडिया' जैसे बहुआयामी संस्थान... और पढ़ें
Previous Post Next Post