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देहरादून, 23 मई, 2026: जब गरीबी, पिता का साया उठ जाना या कोई गंभीर पारिवारिक संकट किसी होनहार बेटी के कदमों को स्कूल-कॉलेज जाने से रोक देता है, तो केवल एक छात्रा की पढ़ाई नहीं रुकती, बल्कि एक पूरे परिवार का भविष्य अंधकार में चला जाता है। ऐसी संकटग्रस्त परिस्थितियों के कारण निस्तेज हो चुकी बालिकाओं की शिक्षा के दीपक में 'शिक्षारूपी लौ' जलाने का काम देहरादून जिला प्रशासन का महत्वाकांक्षी और संवेदनशील "प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा" बखूबी कर रहा है।
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| देहरादून में 39 और बालिकाएं बनीं “नंदा-सुनंदा”, डीएम सविन बंसल ने बांटे ₹12.98 लाख के चेक! |
शनिवार को कलेक्ट्रेट परिसर स्थित ऋषिपर्णा सभागार में इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट के 15वें संस्करण (15th Edition) का भव्य आयोजन किया गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कुशल दिशा-निर्देशन और जिलाधिकारी (DM) सविन बंसल की अनूठी पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में जनपद की 39 और जरूरतमंद व असहाय बालिकाओं की उच्च एवं स्कूली शिक्षा को पुनर्जीवित किया गया। जिलाधिकारी ने इन सभी बालिकाओं को कुल 12.98 लाख रुपये की आर्थिक सहायता राशि के चेक वितरित कर उनके हौसलों को नई उड़ान दी।
भावुक क्षण: जब माताओं और बेटियों का संघर्ष सुन नम हो गईं सबकी आंखें
कलेक्ट्रेट का ऋषिपर्णा सभागार उस समय बेहद भावुक क्षणों का गवाह बना, जब मंच पर आकर इन 39 बालिकाओं और उनकी एकल माताओं (Widows/Single Mothers) ने अपने जीवन की अत्यंत कठिन संघर्षगाथा और पीड़ा को बयां किया।
कई बालिकाओं ने रुंधे गले से बताया कि किस तरह पिता की असामयिक मृत्यु, अचानक आए गंभीर आर्थिक संकट या अकेले दम पर परिवार चला रही मां की लाचारी के कारण उनकी पढ़ाई पूरी तरह से छूटने के कगार पर पहुंच गई थी। फीस न भर पाने के कारण उनके सपने दम तोड़ रहे थे। इन बेटियों के संघर्ष और उनकी माताओं के आंसू देखकर सभागार में मौजूद जिलाधिकारी सविन बंसल, मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी और वहां उपस्थित अन्य अभिभावक अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए और पूरा माहौल अत्यंत संवेदनशील हो गया।
15वें संस्करण में कक्षावार लाभांवित बालिकाओं का वर्गीकरण
इस 15वें चरण के तहत प्राथमिक शिक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) तक की छात्राओं को उनके शैक्षणिक स्तर के आधार पर सहायता राशि के चेक सौंपे गए, जिसका विवरण निम्नलिखित है:
| क्र.सं. | शैक्षणिक स्तर / कक्षा (Educational Level) | लाभांवित बालिकाओं की संख्या | सहायता का मुख्य उद्देश्य |
| 1. | प्राइमरी स्तर (Primary School) | 12 बालिकाएं | प्रारंभिक स्कूली शिक्षा को निरंतर बनाए रखना। |
| 2. | अपर प्राइमरी स्तर (Upper Primary) | 09 बालिकाएं | मिडिल स्कूल की पढ़ाई में ड्रॉप-आउट रोकना। |
| 3. | सेकेंडरी स्तर (Secondary / High School) | 05 बालिकाएं | बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी हेतु संबल देना। |
| 4. | सीनियर सेकेंडरी स्तर (Senior Secondary) | 07 बालिकाएं | इंटरमीडिएट और उच्च शिक्षा की आधारशिला मजबूत करना। |
| 5. | ग्रेजुएशन स्तर (Graduation / UG) | 05 बालिकाएं | टेक्निकल, नर्सिंग और प्रोफेशनल डिग्री को बचाना। |
| 6. | पोस्ट ग्रेजुएशन स्तर (Post Graduation / PG) | 01 बालिकाएं | मास्टर डिग्री (M.Sc.) की पढ़ाई पूरी कराना। |
| कुल योग | सभी स्तर मिलाकर | 39 जरूरतमंद बेटियां | कुल वितरित धनराशि: ₹12.98 लाख |
इन 6 मेधावी बेटियों की उच्च शिक्षा को 'नंदा-सुनंदा' से मिला नया जीवन
प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा के इस संस्करण ने विशेष रूप से उन बेटियों को सहारा दिया जो बड़े प्रोफेशनल कोर्सेज में थीं, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण कॉलेज छोड़ने पर मजबूर थीं। कार्यक्रम में सामने आए कुछ प्रमुख प्रेरणादायक उदाहरण इस प्रकार हैं:
- अंशिका शर्मा (M.Sc. द्वितीय सेमेस्टर): अंशिका की माता जी एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ती हैं। बेहद सीमित मानदेय के कारण उनके लिए एमएससी जैसे बड़े पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स की भारी-भरकम फीस चुकाना नामुमकिन हो रहा था। जिला प्रशासन के चेक ने उनकी मास्टर डिग्री का रास्ता साफ कर दिया।
- अमृता शर्मा (BA-BEd): वर्ष 2020 में अमृता के पिता का असमय निधन हो गया था। तब से उनकी माता आंगनबाड़ी कार्यकर्ती के रूप में पूरे परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं। फीस के अभाव में बाधित हो रही उनकी शिक्षक बनने की ट्रेनिंग (बीए-बीएड) अब इस योजना से निर्बाध जारी रहेगी।
- मदीहा बेग (BCA द्वितीय सेमेस्टर): पिता की मृत्यु के बाद मदीहा के सिर से साया उठ गया था। उनकी माता जी दिन-रात सिलाई का काम करके किसी तरह घर का चूल्हा जला रही थीं। मदीहा का कंप्यूटर एप्लीकेशन (BCA) का सपना अब जिला प्रशासन की मदद से पूरा होगा।
- हर्षिता (BSc OTT): हर्षिता की माता भी एक विधवा महिला हैं जो सिलाई कार्य से परिवार चलाती हैं। मेडिकल फील्ड के इस महंगे कोर्स (B.Sc. Operation Theatre Technology) की फीस भरना उनके वश में नहीं था, जिसे प्रशासन ने सुगम बनाया।
- आंचल पुण्डीर (BSc Nursing): आंचल की नर्सिंग की पढ़ाई पैसों की घोर किल्लत के कारण बीच में ही रुकने की स्थिति में आ गई थी। चेक मिलने के बाद अब वे सम्मान के साथ अपना कोर्स पूरा कर सकेंगी।
- तनिष्का मेहर (B.Sc.): पिता के निधन के बाद पूरा परिवार मां के संघर्षों के सहारे टिका है। आर्थिक संकट के कारण तनिष्का की विज्ञान स्नातक की पढ़ाई पर मंडरा रहा खतरा अब टल गया है।
डीएम सविन बंसल का प्रेरक संदेश: "अवसरों का पूरा लाभ उठाएं, मजबूत इच्छाशक्ति से बदलें अपनी तकदीर"
बेटियों और उनकी माताओं को ढांढस बंधाते हुए और उनका उत्साहवर्धन करते हुए जिलाधिकारी सविन बंसल ने एक बेहद प्रेरक उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि जीवन की राह में उतार-चढ़ाव और विपरीत परिस्थितियां आना स्वाभाविक हैं, लेकिन एक मजबूत इच्छाशक्ति और शिक्षा के हथियार से हर कठिन से कठिन परिस्थिति का मुकाबला किया जा सकता है।
जिलाधिकारी ने कहा:
"प्रोजेक्ट 'नंदा-सुनंदा' केवल एक सामान्य वित्तीय या सरकारी सहायता योजना नहीं है, बल्कि यह हमारी बेटियों के सपनों को टूटने से बचाने और उन्हें एक नई उड़ान देने का एक अत्यंत संवेदनशील मानवीय अभियान है। मुख्यमंत्री जी के स्पष्ट निर्देश हैं कि राज्य की कोई भी मेधावी प्रतिभा केवल इसलिए पीछे न छूट जाए कि उसके पास स्कूल या कॉलेज की फीस भरने के पैसे नहीं थे। जिला प्रशासन की ग्राउंड टीम इन बेटियों को ढूंढकर ला रही है, और हमारा प्रयास है कि हम एक अभिभावक के रूप में इनके साथ खड़े रहें।"
प्रोजेक्ट की अब तक की ऐतिहासिक यात्रा: 175 बेटियों को मिला ₹57 लाख का संबल
देहरादून जिला प्रशासन द्वारा शुरू किया गया यह अनूठा प्रोजेक्ट आज पूरे उत्तराखंड के लिए सुशासन का एक सर्वोत्तम मॉडल बन चुका है। अपनी शुरुआत से लेकर अब तक यह योजना शिक्षा जगत के विभिन्न स्तरों पर बेटियों का सहारा बनी है।
विभिन्न विधाओं में अब तक लाभांवित कुल 175 बालिकाओं का समग्र डेटा
प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा के तहत अब तक कुल 57 लाख रुपये की सहायता राशि वितरित की जा चुकी है, जिसके अंतर्गत शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों की कुल 175 बालिकाओं की शिक्षा को पुनर्जीवित किया गया है:
- प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा: प्राइमरी की 41, अपर प्राइमरी की 31, सेकेंडरी की 24 और सीनियर सेकेंडरी स्तर की 31 बालिकाओं को स्कूल वापस भेजा गया।
- उच्च शिक्षा (Higher Education): सामान्य स्नातक (Graduation) की 34 और पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) की 6 छात्राओं की फीस का भुगतान किया गया।
- शोध एवं अनुसंधान: उच्च स्तरीय शोध कार्य के लिए 2 बालिकाओं को पीएचडी (Ph.D.) करने हेतु विशेष स्कॉलरशिप दी गई।
- मेडिकल एवं टेक्निकल कोर्सेज: चिकित्सा क्षेत्र में 1 बेटी को एमबीबीएस (MBBS) और 1 बेटी को एएनएम (ANM) कोर्स के लिए वित्तीय सहायता दी गई, जबकि 1 छात्रा को सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए संबल मिला।
- व्यावसायिक एवं कौशल विकास: 1 छात्रा को होटल मैनेजमेंट और 2 बालिकाओं को स्किल डेवलपमेंट (कौशल विकास) के कोर्सेज कराकर सीधे रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ा गया।
सीडीओ अभिनव शाह की अपील: "पढ़-लिखकर सक्षम बनें और दूसरों की मदद का जरिया बनें"
इस अवसर पर मुख्य विकास अधिकारी (CDO) अभिनव शाह ने लाभांवित हो रही सभी बालिकाओं से पूरी लगन, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ अपनी पढ़ाई पूरी करने की अपील की। उन्होंने कहा कि आज जिला प्रशासन ने आपके आंसुओं को पोछकर आपको जो अवसर दिया है, उसका सदुपयोग करें। आप आगे चलकर जीवन में इतनी सक्षम और सफल बनें कि भविष्य में स्वयं समाज के अन्य असहाय और जरूरतमंद लोगों के लिए सहयोग का माध्यम (जरिया) बन सकें।
कार्यक्रम के अंत में सभागार में मौजूद सभी 39 बालिकाओं ने एक सुर में जिला प्रशासन से मिली इस वित्तीय सहायता का शत-प्रतिशत सदुपयोग करने का संकल्प लिया। उन्होंने देश और समाज की सेवा करने और एक जिम्मेदार नागरिक बनने की कसम खाई।
समारोह में मौजूद रहे जिले के आला अधिकारी
इस अत्यंत भावुक और गरिमामय कार्यक्रम के सफल संचालन में महिला कल्याण एवं बाल विकास विभाग की टीम का विशेष योगदान रहा। ऋषिपर्णा सभागार में मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह के साथ जिला कार्यक्रम अधिकारी (बाल विकास) जितेन्द्र कुमार, जिला प्रोबेशन अधिकारी मीना बिष्ट, संबंधित विकासखंडों की बाल विकास परियोजना अधिकारी (CDPOs), जिला कलेक्ट्रेट के वरिष्ठ कार्मिक, लाभांवित बालिकाएं और उनके भावुक अभिभावक उपस्थित रहे।
'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के नारे को धरातल पर चरितार्थ करता प्रोजेक्ट
अक्सर सरकारी योजनाएं लालफीताशाही (Bureaucracy) और कागजी औपचारिकताओं में उलझकर रह जाती हैं, लेकिन देहरादून में 'प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा' का 15वां संस्करण यह चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि यदि प्रशासनिक नेतृत्व में संवेदनशीलता और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो कलेक्ट्रेट के दफ्तर भी मानवीय सेवा के मंदिर बन सकते हैं।
एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की बेटी की एमएससी की पढ़ाई बचाना या एक सिलाई करने वाली विधवा महिला की बेटी को बीसीए और नर्सिंग कॉलेज में बनाए रखना, यह सुशासन की वह परिभाषा है जिसकी कल्पना एक जन-कल्याणकारी राज्य में की जाती है। जिलाधिकारी सविन बंसल की यह अद्भुत और दूरदर्शी सोच न केवल देहरादून की 175 बेटियों के जीवन को संवार चुकी है, बल्कि यह पूरे देश के प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक अनुकरणीय नजीर है कि किस तरह सरकारी संसाधनों और फंड्स का सही इस्तेमाल कर समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ी रोती हुई बेटियों की आंखों में आत्मसम्मान और सफलता की चमक बिखेरी जा सकती है।
