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देहरादून, 23 मई, 2026: उत्तराखंड की अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और स्थानीय अधिकारों की रक्षा के लिए दशकों से संघर्षरत राज्य के इकलौते मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दल, उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) ने अपने संगठन विस्तार की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। शनिवार को देहरादून के 10 कचहरी रोड स्थित उक्रांद के केंद्रीय कार्यालय में दल के 'मूल निवास भू-कानून प्रकोष्ठ' द्वारा एक भव्य सदस्यता अभियान कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम के दौरान देवभूमि के मूल सरोकारों और सशक्त भू-कानून की लड़ाई से प्रभावित होकर दर्जनों प्रबुद्ध युवाओं ने उत्तराखंड क्रांति दल की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की। युवाओं के इस बढ़ते जुड़ाव को दल के नेताओं ने राज्य की क्षेत्रीय राजनीति के लिए एक शुभ संकेत बताया है। इसी कार्यक्रम के दौरान संगठन को धरातल पर मजबूत करने के उद्देश्य से बीपी जोशी को मूल निवास भू-कानून प्रकोष्ठ का पछवादून जिला अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिससे पछवादून क्षेत्र में दल की गतिविधियों को नई धार मिलने की उम्मीद है।
प्रकोष्ठ अध्यक्ष लूशुन टोडरिया का संकल्प: "गांव-गांव तक पहुंचेगी मूल निवास और भू-कानून की लड़ाई"
सदस्यता अभियान कार्यक्रम की अध्यक्षता मूल निवास भू-कानून प्रकोष्ठ के केंद्रीय अध्यक्ष लूशुन टोडरिया ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में टोडरिया ने उपस्थित पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और नए शामिल हुए युवाओं में जोश भरते हुए आगामी रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने कहा:
"उत्तराखंड को बने ढाई दशक होने को हैं, लेकिन आज भी राज्य के मूल निवासी अपने ही घर में बेगाने महसूस कर रहे हैं। जब तक हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में भी एक अत्यंत सशक्त और कड़ा भू-कानून लागू नहीं होता और वर्ष 1950 की कट-ऑफ डेट के आधार पर मूल निवास का अधिकार सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक इस राज्य की परिकल्पना अधूरी है। उत्तराखंड क्रांति दल ने तय किया है कि हम इस लड़ाई को केवल देहरादून के धरना स्थलों तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि हमारी टीमें इसे राज्य के प्रत्येक ब्लॉक, ग्राम पंचायत और गांव-गांव तक पहुंचाकर एक बड़ा जनजागरण आंदोलन खड़ी करेंगी।"
उक्रांद मूल निवास भू-कानून प्रकोष्ठ के सदस्यता अभियान एवं संगठनात्मक नियुक्तियों का विवरण
| आयोजन स्थल व तिथि | नव-नियुक्त पदाधिकारी एवं दायित्व | दल में शामिल होने वाले प्रमुख युवा | कार्यक्रम के मुख्य एजेंडे व केंद्रीय मुद्दे |
| केंद्रीय कार्यालय, 10 कचहरी रोड, देहरादून (23 मई, 2026) | बीपी जोशी (पछवादून जिला अध्यक्ष, मूल निवास भू-कानून प्रकोष्ठ) | कुलदीप लिंगवाल, मनजीत सिंह, सुमित नेगी, रविन्द्र सिंह रावत, विजय सिंह पुंडीर आदि। | सशक्त भू-कानून, वर्ष 1950 मूल निवास की अनिवार्यता, सांस्कृतिक पहचान व प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण। |
नवनियुक्त जिला अध्यक्ष बीपी जोशी को मिली पछवादून की कमान
पछवादून क्षेत्र (जिसके अंतर्गत विकासनगर, सहसपुर, कालसी और चकराता का कुछ मैदानी व जनजातीय क्षेत्र आता है) उक्रांद के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस क्षेत्र में बाहरी राज्यों से आ रहे लोगों के कारण जनसांख्यिकीय (Demographic) बदलाव और जमीनों की अंधाधुंध खरीद-फरोख्त एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है।
इसी पृष्ठभूमि में बीपी जोशी की बतौर जिला अध्यक्ष नियुक्ति को बेहद अहम माना जा रहा है। नियुक्ति पत्र सौंपे जाने के बाद बीपी जोशी ने केंद्रीय नेतृत्व का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वे पछवादून के युवाओं, किसानों और प्रबुद्ध नागरिकों को एकजुट कर उत्तराखंड की अस्मिता को बचाने के इस महायज्ञ में अपनी आहुति देंगे। उनका मुख्य फोकस क्षेत्र के युवाओं को स्वरोजगार और स्थानीय नीति से जोड़ना होगा।
विचार-विमर्श के मुख्य बिंदु: इन 4 जलते हुए मुद्दों पर वक्ताओं ने रखी अपनी बात
कार्यक्रम के दौरान उत्तराखंड के वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य और राज्य के संवैधानिक अधिकारों को लेकर वरिष्ठ नेताओं और वक्ताओं ने गहन चिंतन-मनन किया। बैठक के मुख्य प्रस्ताव और वैचारिक बिंदु निम्नलिखित रहे:
- सशक्त भू-कानून की आवश्यकता: वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि कड़े भू-कानून के अभाव में राज्य की कृषि योग्य भूमि और कीमती पर्वतीय संपदाएं बाहरी भू-माफियाओं और कॉर्पोरेट्स के हाथों में कौड़ियों के भाव बिक रही हैं, जिससे स्थानीय निवासी भूमिहीन हो रहे हैं।
- मूल निवास (Cut-off 1950): दल का स्पष्ट स्टैंड है कि उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों और स्थानीय अधिकारों का लाभ केवल उन्हें ही मिलना चाहिए जिनके पूर्वज उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम से पहले यानी वर्ष 1950 से यहाँ रह रहे हैं। स्थायी निवास प्रमाण पत्र (PRC) की वर्तमान व्यवस्था को दल ने छलावा करार दिया।
- सांस्कृतिक पहचान और जनसांख्यिकी की रक्षा: देवभूमि की पारंपरिक पहाड़ी संस्कृति, लोक विधाओं, और सामाजिक ताने-बाने को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सख्त आंतरिक सुरक्षा और बाहरी तत्वों के सत्यापन पर जोर दिया गया।
- प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय हक: उत्तराखंड के पानी (जल), जंगलों (जंगल), और खनिजों (जमीन) पर पहला अधिकार यहाँ के मूल निवासियों का होना चाहिए, न कि बड़ी बाहरी कंपनियों का।
इन युवाओं ने ग्रहण की प्राथमिक सदस्यता; राज्यहित में कार्य करने की ली शपथ
उत्तराखंड क्रांति दल की नीतियों, राज्य आंदोलन के इतिहास और जल-जंगल-जमीन की वैचारिक लड़ाई से प्रेरित होकर देहरादून और उसके आसपास के क्षेत्रों के कई प्रभावशाली युवाओं ने दल का पट्टा पहनकर सदस्यता ली। उक्रांद की सदस्यता लेने वाले प्रमुख युवाओं में शामिल हैं:
- कुलदीप लिंगवाल
- मनजीत सिंह
- सुमित नेगी
- रविन्द्र सिंह रावत
- विजय सिंह पुंडीर
इन सभी युवाओं का वरिष्ठ पदाधिकारियों ने फूल-मालाएं पहनाकर और उक्रांद का पीला-हरा पटका ओढ़ाकर दल में स्वागत किया। सदस्यता लेने के उपरांत सभी युवाओं ने संयुक्त रूप से संकल्प लिया कि वे चुनावी राजनीति के नफे-नुकसान से ऊपर उठकर सबसे पहले उत्तराखंड राज्य की अस्मिता और स्थानीय युवाओं के रोजगार के हकों के लिए जमीनी स्तर पर संघर्ष करेंगे।
शीर्ष नेताओं की गरिमामय उपस्थिति; एकजुटता का संदेश
इस सदस्यता अभियान और संगठनात्मक बैठक के दौरान उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय और महानगर कार्यकारिणी के कई शीर्ष स्तंभ मौजूद रहे, जिन्होंने नए सदस्यों का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से केंद्रीय कोषाध्यक्ष संदीप बिष्ट, केंद्रीय उपाध्यक्ष राकेश नेगी, महानगर अध्यक्ष शुभम नेगी, और केंद्रीय प्रवक्ता प्रवीण रतूड़ी ने अपने विचार रखे। नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण उक्रांद के शहीदों के बलिदान और माताओं-बहनों के लंबे संघर्ष की बदौलत हुआ था, लेकिन आज की राष्ट्रीय पार्टियां राज्य को केवल एक 'रेंटल स्टेट' (पट्टे का राज्य) समझकर लूट रही हैं। इसके अलावा मीडिया प्रभारी दिनेश पंत, दल के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रेम पडियार, केंद्रीय महामंत्री देवचंद उत्तराखंडी एवं वरिष्ठ कार्यकर्ता राजेन्द्र प्रधान ने भी कार्यक्रम में शिरकत की और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के लिए अपने महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए।
क्षेत्रीय चेतना को धार देने में उक्रांद की प्रासंगिकता
देहरादून में उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय कार्यालय में हुआ यह सदस्यता अभियान और युवाओं का पार्टी में शामिल होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उत्तराखंड का युवा आज भी अपनी जड़ों और मूल मुद्दों (जैसे भू-कानून और मूल निवास) को लेकर बेहद संवेदनशील है। राष्ट्रीय दलों की चमक-दमक और चुनावी वादों के बीच, उक्रांद द्वारा लगातार इन क्षेत्रीय मुद्दों को जीवित रखना और युवाओं को इसके इर्द-गिर्द लामबंद करना यह साबित करता है कि राज्य की अस्मिता की लड़ाई में आज भी उक्रांद की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है।
बीपी जोशी जैसे जमीनी कार्यकर्ताओं को पछवादून की कमान सौंपना और युवाओं द्वारा गांव-गांव जाने का संकल्प लेना आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति में एक नए क्षेत्रीय उभार की पटकथा लिख सकता है। देखना होगा कि यह नया जोश धरातल पर कितनी जल्दी एक जनआंदोलन का रूप लेता है।
