उत्तराखंड OBC आयोग सख्त: जनसुनवाई में गूंजे भूमि कब्जे, बहाली और पेंशन के मामले; अध्यक्ष संजय नेगी ने दिए 15 दिन में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश


Aapki Media AI


देहरादून, 26 मई, 2026: उत्तराखंड में सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा तथा उनके प्रशासनिक व व्यक्तिगत शोषण के खिलाफ 'उत्तराखंड अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग' (Uttarakhand OBC Commission) पूरी तरह से एक्शन मोड में नजर आ रहा है। मंगलवार को देहरादून स्थित आयोग के केंद्रीय कार्यालय में विभिन्न जनपदों से आए गंभीर शिकायती प्रकरणों पर एक महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय जनसुनवाई आयोजित की गई। इस जनसुनवाई की अध्यक्षता आयोग के केंद्रीय अध्यक्ष श्री संजय नेगी ने की।

अध्यक्ष संजय नेगी ने दिए 15 दिन में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश


इस दौरान प्रदेश के अलग-अलग कोनों से पहुंचे पीड़ितों की कुल 10 बड़ी और पेचीदा शिकायतों पर बिंदुवार विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। अध्यक्ष संजय नेगी ने नौकरशाही और विभागीय हीलाहवाली पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए संबंधित विभागों के आला अधिकारियों को समयबद्ध सीमा (Time-bound line) के भीतर मामलों को सुलझाने के सख्त निर्देश जारी किए। आयोग की इस त्वरित कार्यप्रणाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंबे समय से लटके तीन गंभीर मामलों का मौके पर ही अंतिम निस्तारण (Spot Disposal) कर दिया गया, जिससे पीड़ितों को तुरंत बड़ी राहत मिली।


अध्यक्ष संजय नेगी का स्पष्ट स्टैंड: "शिकायतों पर टालमटोल बर्दाश्त नहीं, तय समय में मिले न्याय"



जनसुनवाई की शुरुआत करते हुए आयोग के अध्यक्ष श्री संजय नेगी ने सबसे पहले दूर-दराज के गांवों और शहरों से आए सभी शिकायतकर्ताओं का पक्ष बेहद संवेदनशीलता और गंभीरता के साथ सुना। इसके बाद उन्होंने मौके पर मौजूद विभिन्न विभागों के नोडल अधिकारियों से उन प्रकरणों की वर्तमान वस्तुस्थिति (Status Report) और अब तक की गई कार्रवाई की फाइलें तलब कीं।

अध्यक्ष नेगी ने दो-टूक शब्दों में कहा कि आयोग के पास आने वाली शिकायतें केवल कागजी कार्रवाई का हिस्सा नहीं बननी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी कि किसी भी मामले में बेवजह की टालमटोल या फाइलों को दबाने की प्रवृत्ति को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राज्य सरकार की मंशा के अनुरूप अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को त्वरित न्याय दिलाना आयोग का प्राथमिक संवैधानिक दायित्व है।


OBC आयोग की जनसुनवाई में आए 5 सबसे प्रमुख मामले और उन पर जारी निर्देश 



इस जनसुनवाई के दौरान आए 10 मामलों में से जो सबसे गंभीर और जनसरोकारों से जुड़े मामले थे, उनके प्रति आयोग द्वारा अपनाए गए रुख और दिए गए निर्देशों का पूरा विवरण इस प्रकार है:


शिकायतकर्ता का नाम व निवासमामला / शिकायत की प्रकृतिसंबंधित सरकारी विभागआयोग द्वारा जारी किया गया सख्त निर्देश
श्रीमती नन्दिनी गुसाईं (टिहरी गढ़वाल)पैतृक भूमि पर अवैध कब्जे और सुरक्षा का संकट।पुलिस एवं राजस्व विभागमामला सिविल प्रकृति का होने के कारण स्थिति स्पष्ट होने तक शिकायतकर्ता महिला को तत्काल सुरक्षा प्रदान की जाए।
श्री सरोज कुमार (देहरादून)दबंगों द्वारा रोका गया सामान वापस दिलाने की मांग।उत्तराखंड पुलिस (जनपद देहरादून)पुलिस दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर सुने और 15 दिनों के भीतर विस्तृत आख्या आयोग को सौंपे।
श्री सतीश कुमार (हरिद्वार)वन निगम में नियुक्ति एवं रोके गए वेतन का भुगतान।उत्तराखंड वन विकास निगमकर्मचारी के मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए 15 दिन के भीतर स्पष्ट रिपोर्ट उपलब्ध कराएं।
श्री अहसान अंसारी (हरिद्वार)स्थानीय स्तर पर सरकारी राशन (कोटा) की दुकान खुलवाना।खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभागविभाग सकारात्मक कार्रवाई करे। आयोग सदस्य सज्जाद अहमद डीएसओ से समन्वय कर शीघ्र निस्तारण कराएं।
श्री वासुदेव कुशवाहा (देहरादून)एसजीएचएस (SGHS) मेडिकल कटौती में आ रही विसंगति।राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण (SHA)प्राधिकरण के प्रयासों की सराहना की गई, भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति रोकने हेतु गाइडलाइंस जारी करने के निर्देश।

 

विभिन्न मामलों की केस-स्टडी: ज़मीनी हकीकत और आयोग का दखल


जनसुनवाई के दौरान उत्तराखंड की भौगोलिक और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू सामने आए, जिन पर आयोग ने न्यायसंगत हस्तक्षेप किया:


  • टिहरी की बेटी को मिलेगी सुरक्षा: टिहरी गढ़वाल की रहने वाली श्रीमती नन्दिनी गुसाईं ने अपनी भूमि पर दबंगों द्वारा अवैध कब्जे की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस विभाग के अधिकारियों ने आयोग को बताया कि चूंकि यह विवाद पूरी तरह से दीवानी (Civil Nature) प्रकृति का है, इसलिए सक्षम मजिस्ट्रेट के अंतिम आदेश और भूमि की पैमाइश की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही अग्रिम विधिक कार्रवाई संभव है। हालांकि, महिला की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए अध्यक्ष संजय नेगी ने स्थानीय पुलिस को उन्हें तत्काल प्रभाव से सुरक्षा कवच देने का आदेश दिया।
  • हरिद्वार के राशन कोटे पर त्वरित एक्शन: हरिद्वार के श्री अहसान अंसारी द्वारा अपने क्षेत्र में नई सरकारी राशन की दुकान खोलने में आ रही बाधाओं की शिकायत पर आयोग बेहद गंभीर दिखा। खाद्य विभाग को तत्काल सकारात्मक रुख अपनाने को कहा गया। साथ ही आयोग के माननीय सदस्य श्री सज्जाद अहमद को व्यक्तिगत रूप से जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) से को-ऑर्डिनेट कर इस फाइल को तत्काल क्लियर कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
  • स्वास्थ्य कटौती पर अन्य विभागों को नसीहत: देहरादून के श्री वासुदेव कुशवाहा के राज्य सरकार स्वास्थ्य योजना (SGHS) से जुड़े कटौती के मामले में राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के त्वरित कदमों की आयोग ने पीठ थपथपाई। साथ ही यह निर्देश दिया कि भविष्य में किसी भी कर्मचारी को ऐसी तकनीकी दिक्कतों का सामना न करना पड़े, इसके लिए सभी सरकारी विभागों को इस योजना की बारीकियों और नियमों की पूरी जानकारी पहले से उपलब्ध कराई जानी चाहिए।


पुरानी पेंशन, नियुक्ति और कोर्ट केस वाले मामलों पर नीतिगत गाइडलाइंस


इन पांच बड़े मामलों के अलावा जनसुनवाई में राज्य के विभिन्न निगमों और विभागों में पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली, नई नियुक्तियों में ओबीसी आरक्षण के बैकलॉग को भरने, और कतिपय वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े अन्य संवेदनशील मामलों पर भी मैराथन सुनवाई हुई।


आयोग ने संबंधित विभागों के विभागाध्यक्षों (HoDs) से लिखित स्पष्टीकरण मांगते हुए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए। वहीं, जिन मामलों की जांच के दौरान यह पाया गया कि वे प्रकरण पहले से ही माननीय उच्च न्यायालय (High Court) या अन्य अधीनस्थ अदालतों में विचाराधीन (Sub-Judice) हैं, उन्हें आयोग ने नियमानुसार और तय विधिक प्रक्रियाओं के तहत ही निस्तारित करने की हिदायत दी ताकि किसी भी तरह का कानूनी टकराव पैदा न हो।


उत्तराखंड OBC आयोग के कार्य संचालन के 4 मुख्य बिंदु 


आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के वक्तव्यों के आधार पर वर्तमान में आयोग की कार्यप्रणाली के मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:


  • जीरो पेंडेंसी का लक्ष्य: आयोग का प्रयास है कि प्राप्त होने वाली किसी भी शिकायत को तीन महीने से अधिक समय तक लंबित न रखा जाए। यही कारण है कि आज की बैठक में भी 3 मामलों का मौके पर ही फैसला कर दिया गया।
  • निगमों और स्वायत्तशासी संस्थाओं पर नजर: वन विकास निगम, सिडकुल और विद्युत विभागों जैसे स्वायत्त निकायों में पिछड़े वर्ग के कर्मचारियों के हितों और उनकी प्रोन्नति (Promotion) में आरक्षण के नियमों की आयोग लगातार मॉनिटरिंग कर रहा है।
  • सुरक्षात्मक दृष्टिकोण: केवल प्रशासनिक मामलों ही नहीं, बल्कि यदि किसी पिछड़े वर्ग के नागरिक को सामाजिक प्रताड़ना या सुरक्षा का खतरा महसूस होता है, तो आयोग गृह विभाग और पुलिस के माध्यम से उसे तुरंत राहत पहुंचाता है।
  • जमीनी समन्वय: आयोग के सदस्य केवल दफ्तरों में न बैठकर जिलों के जिला पूर्ति अधिकारियों (DSOs), जिला समाज कल्याण अधिकारियों (DSWOs) और जिला मजिस्ट्रेटों (DMs) के साथ सीधे समन्वय स्थापित कर रहे हैं।

 

जनसुनवाई में आयोग की पूरी टीम रही मौजूद


देहरादून के इस गरिमामय और प्रशासनिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन में आयोग की पूरी कोर टीम और प्रशासनिक अमला मुस्तैद रहा। जनसुनवाई में मुख्य रूप से आयोग के माननीय उपाध्यक्ष श्याम डोभाल, सचिव गोरधन सिंह, तथा माननीय सदस्यगण क्रमशः महेन्द्र कुमार वर्मा, विनोद नाथ, सतीश पाल, राकेश उनियाल, मोहब्बत सिंह नेगी, सज्जाद अहमद, प्रहलाद चौधरी, डा० जैड०ए० अंसारी, उमेद चन्द्र रमोला, रूचि गिरी शर्मा एवं साधूराम उपस्थित रहे।


इन सभी सदस्यों ने अपने-अपने आवंटित क्षेत्रों और विभागों की फाइलों का गहनता से अध्ययन किया और पीड़ितों के पक्ष में अपनी संस्तुतियां दीं। इसके साथ ही आयोग के सचिवालय कार्मिकों जिनमें मोहित, माया, गोपाल, विजय लक्ष्मी आदि शामिल थे, ने पूरी जनसुनवाई का आधिकारिक रिकॉर्ड और मिनट्स तैयार करने में सहयोग किया।


अर्ध-न्यायिक संस्था के रूप में उभरता अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग


देहरादून में आयोजित उत्तराखंड अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की यह जनसुनवाई इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि राज्य में आयोग केवल एक सलाहकार या कागजी संस्था बनकर नहीं रह गया है, बल्कि वह एक मजबूत अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) संस्था के रूप में अपनी धमक दिखा रहा है। पुलिस, वन विकास निगम और खाद्य विभाग जैसे बड़े महकमों को 15 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपने का अल्टीमेटम देना यह साफ करता है कि ब्यूरोक्रेसी को अब जनता के प्रति जवाबदेह बनना ही होगा।


अध्यक्ष संजय नेगी के नेतृत्व में तीन शिकायतों का मौके पर निस्तारण और पीड़ित महिलाओं को पुलिस सुरक्षा देने का निर्णय यह दर्शाता है कि यदि प्रशासनिक नीतियां संवेदनशील हों, तो आम नागरिकों का व्यवस्था पर विश्वास और अधिक सुदृढ़ होता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस जनसुनवाई के बाद विभिन्न विभागों को जो कड़े संदेश गए हैं, उससे आने वाले दिनों में सचिवालय से लेकर जिला स्तर के दफ्तरों में फाइलों की गति तेज होगी और ओबीसी वर्ग के नागरिकों के जायज हक उन्हें समय पर मिल सकेंगे।




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Krishna Kumar
लेखक के बारे में

कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 6+ साल पहले 'आपकी मीडिया' जैसे बहुआयामी संस्थान... और पढ़ें
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