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अल्मोड़ा, 30 जून, 2026: देवभूमि उत्तराखंड की सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपराओं, लोक-विश्वासों और सांस्कृतिक धरोहरों को अक्षुण्ण रखने तथा भावी पीढ़ियों के लिए उन्हें विधिक रूप से संजोने के संकल्प के साथ अल्मोड़ा जनपद में एक भव्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। जनपद के ज्यूला (रजवार तोक) स्थित सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक 'गुरु गोरखनाथ मन्दिर' में इन दिनों पावन 'बैशी' (विशेष जागरीय अनुष्ठान) का आयोजन किया जा रहा है।
इस पावन और दिव्य लोक-अनुष्ठान में उत्तराखंड सरकार की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। मंदिर परिसर पहुंचने पर स्थानीय ग्रामीणों, महिला मंगल दलों और मंदिर प्रबंध समिति द्वारा पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल-दमाऊ, हुड़का और भंकोरे) की गूंज और पारंपरिक कुमाऊंनी स्वागत विधाओं के साथ उनका भव्य स्वागत किया गया। इसके उपरांत कैबिनेट मंत्री ने गर्भगृह में देव-आराधना करते हुए समस्त क्षेत्रवासियों और प्रदेशवासियों की सुख, समृद्धि, खुशहाली और आरोग्य की कामना की।
सांस्कृतिक व्याख्या: क्या है 'बैशी' और 'जागर' विधा? लोक-आर्थिकी और पर्यटन में इसका विधिक महत्व
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों, विशेषकर कुमाऊं और गढ़वाल में 'बैशी' और 'जागर' केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि ये समाज को एक सूत्र में पिरोने वाले विधिक सांस्कृतिक स्तंभ हैं।
- देवताओं का आह्वान (Invocation): 'बैशी' एक बहु-दिवसीय विशिष्ट अनुष्ठान होता है, जिसमें 'जागरी' (जागर लगाने वाले मुख्य गायक) द्वारा पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर पौराणिक गाथाओं का गायन कर स्थानीय लोक-देवताओं का आह्वान किया जाता है।
- 22 दिनों का विधिक व्रत (The 22-Day Penance): पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, बैशी में प्रतिभाग करने वाले मुख्य व्रतियों (जिन्हें 'बैश्यार' कहा जाता है) को अत्यंत कठिन नियमों, शुद्धता और 22 दिनों के विधिक अनुशासन व उपवास का पालन करना होता है, जो मानव मन को आत्मिक शुद्धि और ऊर्जा से भर देता है।
अल्मोड़ा बैशी अनुष्ठान 2026: मंदिर प्रबंधन एवं प्रशासनिक सहभागिता मैट्रिक्स
इस भव्य धार्मिक अनुष्ठान को विधिक व सामाजिक रूप से सफल बनाने वाले आयोजकों, मंदिर समिति के पदाधिकारियों और प्रशासनिक/राजनीतिक समन्वयकों का संपूर्ण प्रामाणिक डेटा इस तालिका में संकलित है:
| विशिष्ट विधिक श्रेणी | उपस्थित गणमान्य व्यक्तित्व एवं प्रशासनिक/सामाजिक दायित्व | सांस्कृतिक अनुष्ठान में विशिष्ट विधिक व सामाजिक भूमिका |
| मुख्य अतिथि | श्रीमती रेखा आर्या, माननीय कैबिनेट मंत्री, उत्तराखंड सरकार। | देव-आराधना, लोक-संस्कृति संवर्धन एवं नीतिगत वक्तव्य। |
| संगठनात्मक विंग | गणेश जलाल (मंडल अध्यक्ष), देवेंद्र मेहरा (मंडल महामंत्री)। | क्षेत्रीय जन-भागीदारी एवं संगठनात्मक विधिक समन्वय। |
| विधायक प्रतिनिधि | भुवन जोशी, सुंदर राणा (सोमेश्वर मंडल अध्यक्ष)। | जन-शिकायतों का संकलन एवं क्षेत्रीय विकास समीक्षा। |
| स्थानीय स्वशासन | प्रकाश टम्टा (ग्राम प्रधान ज्यूला), सूरज, प्रदीप (ग्राम प्रधान)। | जमीनी स्तर पर बुनियादी सुविधाओं एवं सुरक्षा का प्रबंधन। |
| मंदिर प्रबंध समिति | बलवंत सिंह रजवार (अध्यक्ष), हरीश रजवार (उपाध्यक्ष)। | संपूर्ण बैशी अनुष्ठान का आंतरिक एवं विधिक संचालन। |
| वित्तीय व रसद विंग | पान सिंह रजवार (कोषाध्यक्ष), रतन सिंह रजवार, सुंदर सिंह। | अनुष्ठान के भंडारे और वित्तीय पारदर्शिता का विधिक प्रबंधन। |
| सक्रिय विधिक सहयोगी | राजेंद्र सिंह पिलख्वाल, हरि सिंह रजवार, सुरेंद्र सिंह रजवार, संजय सिंह। | आगंतुकों की सुरक्षा, आवास एवं अनुष्ठानिक अनुशासन। |
| महिला मंगल दल प्रतिनिधि | उमा रजवार, पाना रजवार एवं स्थानीय मातृशक्ति। | पारंपरिक स्वागत, सांस्कृतिक कीर्तन एवं भोजन व्यवस्था। |
कैबिनेट मंत्री का नीतिगत वक्तव्य: 'सांस्कृतिक विरासत' ही उत्तराखंड की वास्तविक वैश्विक पहचान है
भव्य धार्मिक अनुष्ठान के दौरान उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या भावविभोर हो उठीं। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण ईश्वरीय ऊर्जा से ओतप्रोत है। हमारी समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक परिधान, लोक-गीत और अगाध धार्मिक आस्था ही विश्व पटल पर हमारी असली और क्रेडिबल (Credible) पहचान है।
उन्होंने आगे कहा कि हमारी पावन धरा पर 'बैशी' और 'जागर' जैसी विधाएं एक अनमोल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत हैं। इस भक्तिमय व दिव्य माहौल में उपस्थित होकर उनका मन अत्यंत ऊर्जा से भर गया है। कैबिनेट मंत्री ने जोर देकर कहा कि पश्चिमीकरण के इस आधुनिक युग में हमारी यह पारंपरिक आस्था आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक और प्रकाश पुंज की तरह है। इसे मूल स्वरूप में संजोकर रखना और युवा पीढ़ी को इससे जोड़ना हम सबका परम और विधिक कर्तव्य है। उन्होंने इस भव्य और सफल आयोजन के लिए समस्त ग्रामवासियों, आयोजकों और क्षेत्र की देवतुल्य जनता को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।
उत्तराखंड की लोक-संस्कृति और धार्मिक पर्यटन को सुदृढ़ करने के 4 मुख्य विधिक स्तंभ
राज्य सरकार की सांस्कृतिक नीतियों के अनुसार, पर्वतीय क्षेत्रों में धार्मिक आस्था को संवर्धित करने और पलायन रोकने हेतु निम्नलिखित चार विधिक स्तंभों पर कार्य किया जा रहा है:
- 'जागर' और लोक-गाथाओं का डिजिटल प्रलेखीकरण (Digital Documentation): कुमाऊं और गढ़वाल की लुप्त होती जा रही मौखिक लोक-गाथाओं और जागरी विधाओं को भावी पीढ़ी के लिए डिजिटल लाइब्रेरी और ऑडियो-विजुअल माध्यमों से विधिक रूप से संरक्षित करना।
- सांस्कृतिक मेलों को विधिक राजकीय दर्जा: अल्मोड़ा के गुरु गोरखनाथ मंदिर जैसे ऐतिहासिक लोक-तीर्थों में आयोजित होने वाले बड़े सांस्कृतिक अनुष्ठानों को 'राजकीय मेला' घोषित कर उनके बुनियादी ढांचे के विकास हेतु बजट आवंटित करना।
- धार्मिक होमस्टे (Spiritual Homestays) का विकास: बैशी जैसे 22 दिवसीय अनुष्ठानों का अनुभव करने के लिए आने वाले राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार को बढ़ावा देने हेतु 'होमस्टे सब्सिडी' देना।
- स्थानीय कलाकारों और जागरी गुरुओं को विधिक पेंशन: लोक-संस्कृति को जीवित रखने वाले वृद्ध जागरी गायकों, हुड़किया कलाकारों और पारंपरिक शिल्पकारों को संस्कृति विभाग के माध्यम से मासिक मानदेय और विधिक सुरक्षा प्रदान करना।
सांस्कृतिक सुशासन और लोक-चेतना का एक नव-प्रगतिशील स्वरूप
30 जून 2026 को अल्मोड़ा के ज्यूला (रजवार तोक) से सामने आई यह भव्य सांस्कृतिक तस्वीर इस प्रशासनिक और सामाजिक सत्य को रेखांकित करती है कि कोई भी राज्य अपनी जड़ों से कटे बिना ही वास्तविक प्रगति कर सकता है।
कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या की इस सुदूरवर्ती ग्रामीण धार्मिक अनुष्ठान में सक्रिय सहभागिता यह सिद्ध करती है कि उत्तराखंड सरकार लोक-आस्था के संरक्षण के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है। मंडल अध्यक्ष गणेश जलाल, जिला उपाध्यक्ष देवेंद्र नयाल, आनंद नेगी, पप्पू मेहरा, पूरन फर्त्याल, राजेंद्र सिंह, विजय फर्त्याल, नवीन आर्य और महेंद्र जैसे राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि देवभूमि में 'सांस्कृतिक सुशासन' (Cultural Governance) ही जनता और सरकार के बीच सीधे विधिक संवाद का सबसे सशक्त और क्रेडिबल माध्यम है। यह आयोजन आने वाले समय में उत्तराखंड के लोक-धार्मिक पर्यटन को एक नई दिशा प्रदान करेगा।

