रामनगर डांडा भूमि विवाद में नया विधिक मोड़: 7 दशकों के पैतृक कब्जे का दावा कर न्यायालय पहुंचे लक्ष्मण सिंह; प्रेस क्लब में रोया दुखड़ा, संजीव गुप्ता की रजिस्ट्री को बताया फर्जी


Aapki Media AI


देहरादून, 18 जून, 2026: उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के थानो क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले रामनगर डांडा में करोड़ों रुपये की बेशकीमती भूमि के मालिकाना हक को लेकर चल रहा विवाद अब एक बेहद जटिल और हाई-प्रोफाइल विधिक मोड़ पर पहुंच गया है। कल जहां इस मामले के दूसरे पक्ष संजीव गुप्ता ने प्रेस वार्ता कर विपक्षियों पर गंभीर आरोप लगाए थे, वहीं आज दूसरे पक्ष के मुख्य पैरोकार लक्ष्मण सिंह और उनके परिवार ने देहरादून स्थित 'उत्तरांचल प्रेस क्लब' में एक विशाल प्रेस वार्ता (Press Conference) आयोजित कर मामले का दूसरा पहलू साक्ष्यों सहित मीडिया के सामने रखा।

 

रामनगर डांडा भूमि विवाद में नया विधिक मोड़: 7 दशकों के पैतृक कब्जे का दावा कर न्यायालय पहुंचे लक्ष्मण सिंह

 


प्रेस को संबोधित करते हुए भावुक हुए लक्ष्मण सिंह ने अपनी पैतृक और पूर्वजों की भूमि से जुड़े इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद को लेकर वर्ष 2026 में पुनः सक्षम न्यायालय में नियमित विधिक वाद (Lawsuit) दायर करने की आधिकारिक घोषणा की। लक्ष्मण सिंह ने कड़े विधिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया कि जिस भूमि को हड़पने का प्रयास किया जा रहा है, वह असल में उनके पूर्वजों के समय से एक 'फार्मिंग सोसायटी' के विधिक कब्जे में थी और उनका परिवार इस ज़मीन पर वर्ष 1952 से निरंतर कृषि कार्य और भौतिक कब्जे (Adverse/Continuous Possession) में शांतिपूर्ण रूप से रह रहा है।


विवाद की विधिक जड़: वर्ष 2013 में 'कब्जे' के बावजूद कथित फर्जी तरीके से हुआ विक्रय


लक्ष्मण सिंह ने पत्रकारों को मामले की क्रोनोलॉजी और विधिक पृष्ठभूमि समझाते हुए बताया कि रामनगर डांडा की इस विवादित भूमि पर उनके परिवार का सात दशकों से वास्तविक और अविवादित कब्जा रहा है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब वर्ष 2013 में कथित रूप से अत्यंत अनियमित, भ्रामक और फर्जी तरीके से इस पैतृक भूमि का विक्रय (Sale Deed) विपक्ष के संजीव गुप्ता के पक्ष में कर दिया गया।


विधिक उल्लंघन का आरोप: लक्ष्मण सिंह का विधिक तर्क है कि वर्ष 2013 में जब इस भूमि की कथित रजिस्ट्री की गई, उस समय मौके पर उनके परिवार का पक्का कब्जा, फसलें और मकान विद्यमान थे। संपत्ति के क्रय-विक्रय के स्थापित विधिक नियमों के अनुसार, बिना भौतिक कब्जे के हस्तांतरण और वास्तविक भूमियों की स्थिति को छुपाकर यह पूरी रजिस्ट्री की गई, जिसमें भूमि के वास्तविक ऐतिहासिक स्वत्व (Historic Title) को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया।


थानो रामनगर डांडा भूमि प्रकरण: लक्ष्मण सिंह बनाम संजीव गुप्ता विधिक केस मैट्रिक्स


इस जटिल भूमि विवाद के दोनों पक्षों के दावों, ऐतिहासिक कूटनीतिक कड़ियों और 2026 की वर्तमान विधिक स्थिति को इस प्रशासनिक तालिका में निष्पक्ष रूप से संकलित किया गया है:

विधिक चरण एवं कालक्रम (Timeline)लक्ष्मण सिंह एवं परिवार का विधिक दावा (Plaintiffs)संजीव गुप्ता (विपक्षी पक्ष) का स्टैंड (Defendants)राजस्व एवं न्यायालयीन विधिक स्थिति (Legal Status 2026)
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (1952 से)पूर्वजों के समय से फार्मिंग सोसायटी की भूमि पर 100% निरंतर खेती व भौतिक कब्जा।ऐतिहासिक कब्जे को 'अवैध और अतिक्रमण' की श्रेणी में बताना।उत्तर प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम (LR Act) के तहत कब्जे के साक्ष्यों का परीक्षण।
विवाद का उद्गम (वर्ष 2013)भूमि को नियमों के विरुद्ध और तथ्यों को छुपाकर संजीव गुप्ता के पक्ष में बेचा गया।ऋषिकेश तहसील के सरकारी रिकॉर्ड एवं बैनामे के आधार पर मालिकाना हक का दावा।रजिस्ट्री की वैधता (Validity of Sale Deed) को सिविल कोर्ट में विधिक चुनौती।
प्रथम विधिक प्रयास (वर्ष 2017)पिता स्वर्गीय संतराम द्वारा सक्षम न्यायालय में मालिकाना हक हेतु नियमित वाद दायर।मुकदमे के दौरान तकनीकी आपत्तियां और राजस्व आख्याएं प्रस्तुत करना।वादी (संतराम जी) के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के कारण कार्यवाही में विधिक शिथिलता आई।
पुनः न्यायिक शरण (वर्ष 2026)पुत्र लक्ष्मण सिंह द्वारा वर्ष 2026 में नए साक्ष्यों के साथ पुनः वाद (Fresh Suit) दायर।बडोनी और नेगी परिवार सहित लक्ष्मण सिंह पर अवैध कब्जे का आरोप लगाना।माननीय सिविल न्यायालय के समक्ष मामला विचाराधीन; साक्ष्यों का मिलान जारी।
प्रशासनिक मांग (Current Relief)विवादित स्थल पर किसी भी प्रकार के नए निर्माण या जबरन कब्जे पर तुरंत विधिक रोक (Stay Order)।पुलिस प्रशासन (SSP/IG) को शिकायती पत्र भेजकर सुरक्षा की मांग।जिला प्रशासन द्वारा कानून-व्यवस्था बनाए रखने हेतु मौके पर यथास्थिति (Status Quo)।

ऐतिहासिक मुकदमा: पिता स्वर्गीय संतराम की अधूरी विधिक लड़ाई को 2026 में आगे बढ़ाएंगे लक्ष्मण सिंह


प्रेस वार्ता के दौरान लक्ष्मण सिंह अपने पिता को याद कर भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि इस अन्याय के खिलाफ सबसे पहले उनके पिता स्वर्गीय संतराम ने वर्ष 2017 में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और एक मजबूत विधिक वाद दायर किया था।


परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था; मुकदमे की विधिक कार्यवाही और गवाहियों के दौर के बीच में ही उनके पिता संतराम का अचानक दुखद निधन हो गया। वादी के निधन और परिवार के गहरे सदमे में होने के कारण वह मुकदमा विधिक रूप से प्रभावी पैरवी के अभाव में आगे नहीं बढ़ सका, जिसका अनुचित लाभ विपक्षी पक्ष द्वारा उठाया गया। अब, वर्ष 2026 में लक्ष्मण सिंह ने स्वयं वादी के रूप में आगे बढ़कर अपने पूर्वजों की विरासत और परिवार के अधिकारों की रक्षा के लिए पुनः न्यायालय की शरण ली है, ताकि उनके पिता की अधूरी विधिक लड़ाई को तार्किक और न्यायसंगत अंत तक पहुंचाया जा सके।


लक्ष्मण सिंह का बड़ा आरोप: 'भूमाफिया' का झूठा प्रोपेगैंडा रचकर किया जा रहा है मानसिक उत्पीड़न


लक्ष्मण सिंह और उनके परिवार के सदस्यों ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया कि वे कोई भू-माफिया या जमीनों के सौदागर नहीं हैं, बल्कि वे इसी मिट्टी से जुड़े साधारण और सीधे किसान हैं।


लक्ष्मण सिंह एवं परिवार का आधिकारिक विधिक बयान:


"हमारा परिवार पिछले 74 वर्षों (सात दशकों से अधिक) से इस भूमि की देखरेख कर रहा है और यहीं से हमारी आजीविका चलती है। विपक्षी पक्ष धनबल और प्रशासनिक रसूख के दम पर हमारे इस ऐतिहासिक और विधिक कब्जे को 'भूमाफिया' की गतिविधि बताकर स्थानीय मीडिया और वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह कर रहा है। असलियत यह है कि हमारी साख को खराब करने और हमें मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए हमारे खिलाफ झूठे आरोप गढ़े जा रहे हैं। हमें देश की न्यायपालिका पर शत-प्रतिशत विधिक विश्वास है। हम न्यायालय के समक्ष अपने राजस्व अभिलेख, बिजली-पानी के प्राचीन साक्ष्य, फार्मिंग सोसायटी के मूल दस्तावेज और ७० वर्षों के कब्जे के गवाह प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें पूरा भरोसा है कि माननीय न्यायालय हमारे साथ न्याय करेगा।"


 

न्यायिक प्रक्रिया के सुचारू संचालन हेतु लक्ष्मण सिंह परिवार की 4-स्तरीय प्रशासनिक मांगें


रामनगर डांडा की शांति व्यवस्था बनाए रखने और विधिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए पीड़ित परिवार ने शासन-प्रशासन के समक्ष चार प्रमुख मांगें रखी हैं:

  • 'यथास्थिति' (Status Quo) का विधिक अनुपालन: चूंकि मामला अब वर्ष 2026 में पुनः माननीय न्यायालय के विचाराधीन (Sub-Judice) हो चुका है, इसलिए जब तक न्यायालय का कोई अंतिम विधिक फैसला नहीं आता, तब तक विवादित भूमि की भौतिक स्थिति को पूरी तरह यथावत रखा जाए।
  • अवैध निर्माण और ध्वस्तीकरण पर रोक: विपक्षी पक्ष द्वारा पुलिस के साये में ज़मीन पर किसी भी प्रकार की बाउंड्री वॉल, पिलर या नए निर्माण कार्य करने के प्रयासों पर जिला प्रशासन तुरंत विधिक रोक लगाए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।
  • एकतरफा पुलिसिया उत्पीड़न पर लगाम: राजस्व विभाग और सिविल कोर्ट की अंतिम डिक्री आने से पहले पुलिस प्रशासन किसी भी पक्ष के दबाव में आकर स्थानीय काश्तकारों और लक्ष्मण सिंह के परिवार के खिलाफ कोई एकतरफा दंडात्मक या दमनकारी विधिक कार्रवाई न करे।
  • सोसायटी के रिकॉर्ड की निष्पक्ष विधिक जांच: जिलाधिकारी देहरादून स्वयं एक विशेष जांच दल (SIT) गठित कर वर्ष 1952 की मूल फार्मिंग सोसायटी के विधिक दस्तावेजों की स्क्रूटनी करवाएं, जिससे यह साफ हो सके कि किस प्रकार बाद के वर्षों में इस भूमि के स्वरूप के साथ कागजी हेरफेर की कोशिश की गई।

 

सिविल कोर्ट की चौखट पर तय होगा सात दशकों के 'कब्जे' और 'रजिस्ट्री' का विधिक भाग्य


थानो के रामनगर डांडा (देहरादून) का यह भूमि प्रकरण इस बात का उत्कृष्ट विधिक उदाहरण है कि भारतीय राजस्व कानून में "कब्जा बनाम विधिक दस्तावेज" (Possession vs. Title Deed) की लड़ाई कितनी पेचीदा हो सकती है। एक तरफ जहां संजीव गुप्ता वर्ष 2013 के अपने विधिक क्रय विलेख (रजिस्ट्री) और खतौनी में दर्ज नाम के आधार पर मालिकाना हक का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लक्ष्मण सिंह का परिवार वर्ष 1952 से चले आ रहे लगातार 74 वर्षों के पैतृक कृषि कब्जे, कब्जे के साक्ष्यों और फार्मिंग सोसायटी के मूल अधिकारों की विधिक दुहाई दे रहा है।


चूंकि इस मामले में दोनों ही पक्षों द्वारा उत्तरांचल प्रेस क्लब के एक ही मंच से लगातार दो दिनों में अपनी-अपनी व्यथा और साक्ष्य प्रस्तुत किए जा चुके हैं, इसलिए यह मामला अब पूरी तरह से माननीय सिविल न्यायालय की विधिक बुद्धिमत्ता पर निर्भर करता है। भारतीय कानून के सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई मामला अदालत में विचाराधीन होता है, तो प्रशासन का प्राथमिक दायित्व मौके पर शांति व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी पक्ष को कानून हाथ में लेने से रोकना होता है। लक्ष्मण सिंह द्वारा 2026 में पुनः कानूनी लड़ाई शुरू करना यह दर्शाता है कि यह विवाद इतनी आसानी से शांत होने वाला नहीं है। इस हाई-प्रोफाइल मामले का अंतिम विधिक निस्तारण केवल और केवल अदालत के अंतिम फैसले से ही संभव होगा, जिसका दोनों पक्षों को पूरी विधिक मर्यादा के साथ इंतजार करना चाहिए।




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Krishna Kumar
लेखक के बारे में

कृष्ण कुमार

कृष्ण कुमार को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 6+ साल पहले 'आपकी मीडिया' जैसे बहुआयामी संस्थान... और पढ़ें
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