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श्री एकादशमुखी हनुमान मंदिर देहरादून : उत्तराखंड की पावन देवभूमि न केवल सुरम्य हिमालयी वादियों बल्कि अत्यंत गुप्त और जाग्रत सिद्ध पीठों की भी विधिक कर्मभूमि रही है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के अत्यंत रमणीक और प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब जामुनवाला गांव में स्थित "दिव्य शक्ति केंद्र श्री एकादशमुखी (11 मुखी) हनुमान मंदिर" वर्तमान कलयुग में प्रत्यक्ष दैवीय चेतना का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।
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| श्री एकादशमुखी हनुमान मंदिर ,जामुनवाला , देहरादून |
संपूर्ण भारतवर्ष में ग्यारह मुखी हनुमान जी के केवल 4 प्रामाणिक मंदिर स्थापित हैं, जिनमें से समूचे उत्तर भारत और विशेषकर उत्तराखंड का एकमात्र सिद्ध पीठ देहरादून के इसी जामुनवाला क्षेत्र में नून नदी के पावन तट पर स्थित है। वर्ष 2007 में स्थापित यह मंदिर आज देश-विदेश के श्रद्धालुओं, योगियों और विशेष विधिक अनुष्ठान करने वाले राजनेताओं के लिए परम आस्था का केंद्र बन चुका है, जहां हनुमान जी की परिक्रमा मात्र से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
बाबा बजरंग दास जी का विस्मयकारी दर्शन और भवानी गिरी महाराज का संकल्प
इस जाग्रत सिद्ध पीठ की स्थापना की पृष्ठभूमि अत्यंत अलौकिक और विस्मयकारी है: 135 वर्षीय सिद्ध योगी बाबा बजरंग दास - वर्ष 1995 में इस मंदिर के संस्थापक परम पूज्य मुख्य पंडित भवानी गिरी जी महाराज को सिद्ध संत बाबा बजरंग दास जी के दर्शन प्राप्त हुए थे। बाबा बजरंग दास की आयु उस समय 135 वर्ष थी और वे विगत 55 वर्षों से अन्न ग्रहण नहीं करते थे। वे केवल काली गाय का दूध और जलती हुई अग्नि (धूनी) के भीतर पके हुए केवल 4 आलू का सेवन करते थे। बाबा बजरंग दास को साक्षात हनुमान जी के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त होते थे।
जब भवानी गिरी महाराज ने बाबा बजरंग दास के मुख से प्रभु हनुमान के सात मुखी और ग्यारह मुखी स्वरूपों की परम दिव्य महिमा और विधिक ऊर्जा के बारे में सुना, तो उनके मन में एक गहरा आध्यात्मिक प्रश्न उठा—यदि सतयुग और त्रेतायुग में हनुमान जी ने इतने शक्तिशाली रूप धारण किए, तो वर्तमान में उनकी प्रतिमाएं और मंदिर धरा से विलुप्त क्यों हैं? उसी क्षण महाराज ने संकल्प लिया कि भविष्य में सामर्थ्य आने पर वे लोक कल्याण हेतु 'एकादशमुखी हनुमान' की प्राण-प्रतिष्ठा करेंगे।
श्री एकादशमुखी हनुमान मंदिर जामुनवाला: स्थापना, भूगोल एवं आध्यात्मिक मैट्रिक्स
इस जाग्रत सिद्ध पीठ की भौगोलिक अवस्थिति, स्थापना के संघर्ष और आध्यात्मिक विभव का प्रामाणिक विवरण इस तालिका में संकलित है:
| आध्यात्मिक एवं भौतिक घटक | ऐतिहासिक प्रामाणिकता एवं वर्तमान स्थिति (वर्ष 2026) | प्रमुख विधिक एवं आध्यात्मिक व्यक्तित्व | भक्तों और सुशासन पर क्रेडिबल प्रभाव |
| स्थापना वर्ष | वर्ष 2007 (स्थापना का आधार वर्ष 1995 का संकल्प) | महाराज भवानी गिरी जी (मुख्य सिद्ध संत व संस्थापक) | देहरादून के जामुनवाला में आध्यात्मिक चेतना का महा-केंद्र। |
| साधना काल और स्थान | 45 दिनों का अनवरत अखंड जाप, नून नदी का तट | जे. बी. गुरुंग (स्थानीय सहयोगी व भूमि प्रदाता) | अदृश्य शक्तियों से संघर्ष कर सिद्धि प्राप्त; भूत-प्रेत बाधाओं का अंत। |
| भौगोलिक विशिष्टता | नून नदी का किनारा, जामुनवाला वन क्षेत्र | ऋषि मांडु महाराज (दत्तात्रेय के शिष्य) का विश्राम स्थल | शांत, रमणीक और प्राकृतिक ऊर्जा से भरपूर ध्यान साधना केंद्र। |
| ऐतिहासिक जुड़ाव | श्री माडू सिद्ध बाबा मंदिर का पारंपरिक मार्ग | स्वयंभू शिवलिंग क्षेत्र (पड़ोसी इलाका) | प्राचीन मांडु ऋषि की तपस्थली होने के कारण अत्यधिक जाग्रत भूमि। |
नून नदी में 45 दिनों का महा-तप: अदृश्य शक्तियों का प्रहार और सिद्धि का उदय
जामुनवाला गांव के शांत और रमणीक वातावरण ने भवानी गिरी जी महाराज को अपनी ओर आकर्षित किया। यहां न कोई अन्य मंदिर था और न ही कोलाहल । भौगोलिक स्थिति को अनुकूल पाकर महाराज ने नून नदी के समीप कुटिया बनाकर 45 दिनों की अत्यंत कठिन और प्राणघातक साधना प्रारंभ की। साधना के दौरान महाराज के साथ अत्यंत विचित्र और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं घटीं। जब वे हनुमान जी के मंत्रों का अनवरत जाप करते थे, तब तांत्रिक व नकारात्मक अदृश्य शक्तियों द्वारा उन्हें जबरन आसन से उठाने का प्रयास किया जाता था। साधना के प्रभाव से महाराज के पूरे शरीर पर चोटों के गहरे निशान बन गए थे। जब वीर हनुमान की हुंकार गूंजती थी, तो पूरी कुटिया और महाराज का शरीर कांपने लगता था। साधना के दौरान जैसे ही अखंड ज्योत बुझने लगती, कोई अदृश्य शक्ति महाराज के शरीर को हिलाकर सचेत कर देती थी।
इस कठिन तपस्या में स्थानीय निवासी जे. बी. गुरुंग ने महाराज की अनवरत सेवा की। सिद्धि प्राप्त होने के बाद महाराज के वचनों में वह विधिक सामर्थ्य आया कि केवल मंदिर की भभूत (विभूति) देने मात्र से ही लोगों की असाध्य बीमारियां, भूत-प्रेत बाधाएं और तंत्र-मंत्र के नकारात्मक प्रभाव तुरंत समाप्त होने लगे। इस चमत्कार से प्रभावित होकर स्थानीय ग्रामीणों ने मंदिर निर्माण के लिए सहर्ष भूमि दान देना प्रारंभ कर दिया।
पौराणिक कथा-1: कालकारमुख राक्षस का वध और रुद्र अवतार की उत्पत्ति
शास्त्रों और ग्यारह मुखी हनुमान कथा के अनुसार, देवताओं को त्रस्त करने वाले अत्यंत भयानक राक्षस 'कालकारमुख' का वध करने के लिए पवनपुत्र को यह रूप लेना पड़ा था।
- कालकारमुख राक्षस के पास भी 11 मुख थे और उसे हराना सामान्य देवताओं के वश में नहीं था। जब उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया, तब देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली। भगवान शिव ने अपने ग्यारहवें रुद्र अवतार के रूप में हनुमान जी को एकादशमुखी रूप धारण करने का विधिक आशीर्वाद प्रदान किया। इस परम शक्तिशाली और रौद्र रूप को धारण कर हनुमान जी ने कालकारमुख राक्षस का अंत किया और ब्रह्मांड में धर्म की पुनर्स्थापना की।
पौराणिक कथा-2: जब राम-नाम के प्रताप के सामने राम को ही चलाना पड़ा ब्रह्मास्त्र
इस मंदिर से जुड़ी दूसरी विस्मयकारी कथा त्रेतायुग के उस धर्मसंकट से संबंधित है, जब स्वयं भगवान श्री राम और उनके परम भक्त हनुमान जी के बीच विधिक युद्ध छिड़ गया था:
नारद मुनि की लीला: नारद जी ने 'राम' नाम की शक्ति को सिद्ध करने के लिए एक लीला रची। उनके कहने पर एक राजकुमार ने अनजाने में ऋषि विश्वामित्र का अपमान कर दिया। क्रोधित विश्वामित्र ने श्री राम से गुरु दक्षिणा के रूप में उस राजकुमार का वध करने की मांग की। प्राण रक्षा के लिए व्याकुल राजकुमार नारद जी के परामर्श पर माता अंजनी की शरण में गया। माता अंजनी ने हनुमान जी को उस राजकुमार की रक्षा का वचन दे दिया। जब हनुमान जी को ज्ञात हुआ कि शत्रु स्वयं उनके आराध्य प्रभु श्री राम हैं, तो वे भीषण धर्मसंकट में पड़ गए। परंतु वचनबद्ध होने के कारण दोनों ओर से युद्ध प्रारंभ हुआ। युद्ध के दौरान जब श्री राम ने चारों दिशाओं से तीरों की वर्षा की, तब हनुमान जी ने राम-नाम का संकीर्तन करते हुए अपने भक्त की रक्षा के लिए ग्यारहवां रूप धारण कर लिया। युद्ध इतना भीषण हो गया कि श्री राम को ब्रह्मास्त्र का आह्वान करना पड़ा। अंततः देवगणों के हस्तक्षेप और विश्वामित्र द्वारा राजकुमार को क्षमा करने पर यह युद्ध शांत हुआ। तब प्रसन्न होकर श्री राम ने हनुमान जी को आशीर्वाद दिया कि कलयुग में उनका यह एकादश स्वरूप भक्तों के सभी कष्टों को तत्क्षण हर लेगा।
हनुमान जी के ग्यारह मुखों का अलौकिक प्रतीक और उनके विधिक लाभ
एकादश मुखी हनुमान जी के ग्यारह चेहरे अलग-अलग ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं और विधिक शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं:
- वानर (कपि) मुख: शत्रुओं और अदृश्य विरोधियों पर पूर्ण विजय सुनिश्चित करता है। (विशेष: पूर्वमुखी हनुमान जी शत्रुओं के नाश के लिए अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है)।
- सिंह (नरसिंह) मुख: भक्तों के भीतर असीमित मानसिक शक्ति, दृढ़ता और निर्भयता का संचार करता है।
- वराह मुख: आरोग्य प्रदान करता है और असाध्य शारीरिक रोगों का समूल नाश करता है।
- गरुड़ मुख: जीवन में आने वाली अचानक विपत्तियों, अकाल मृत्यु के योग और कालसर्प दोष का नाश करता है।
- हयग्रीव मुख: विद्यार्थियों और साधकों को परम ज्ञान, एकाग्रता और कुशाग्र बुद्धि प्रदान करता है।
- नाग (सर्प) मुख: विषैले जंतुओं के भय, सर्पदंश और मानसिक भ्रम से विधिक मुक्ति दिलाता है।
- भैरव मुख: तंत्र-मंत्र, नकारात्मक ऊर्जाओं, नजर दोष और ऊपरी बाधाओं का तत्काल शमन करता है।
- अग्निरूप मुख: शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और महामारी जनित रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।
- रुद्र मुख: देवाधिदेव महादेव भगवान शिव की परम कृपा और उनके ग्यारह रुद्रों का संयुक्त आशीर्वाद दिलाता है।
- सुग्रीव/विष्णु मुख: जीवन में ऐश्वर्य, यश, कीर्ति, अटूट समृद्धि और व्यापारिक सफलता प्रदान करता है।
- श्री राम (सौम्य) मुख: अंतःकरण में परम शांति, प्रभु राम की अविचल भक्ति और पारिवारिक सामंजस्य की स्थापना करता है।
राजनीति में सफलता का महा-केंद्र: उत्तराखंड के नेताओं का गुप्त अनुष्ठान स्थल
इस मंदिर की एक अत्यंत क्रेडिबल और विशिष्ट बात यह है कि इसे "राजनीतिक विजय का सिद्ध पीठ" भी माना जाता है। उत्तराखंड के कई शीर्ष राजनेता, मंत्री और चुनावी प्रत्याशी अपनी राजनीतिक सफलता, टिकट प्राप्ति और प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त करने के लिए यहां आकर अत्यंत गोपनीय और विशेष विधिक अनुष्ठान करवाते हैं। पंडित भवानी गिरी जी के सानिध्य में किए जाने वाले इन विशिष्ट अनुष्ठानों का फल कई नेताओं को मिला भी है और आज वे शासन-प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं। हालांकि, मंदिर की विधिक आचार संहिता और गोपनीयता के नियमों के कारण इन राजनेताओं के नामों और अनुष्ठानों की विविष्ट जानकारी को पूर्णतः गोपनीय (Secret) रखा जाता है।
कलयुग में साक्षात देव-चेतना का अनुपम प्रकाश स्तंभ
देहरादून के जामुनवाला में स्थापित दिव्य शक्ति केंद्र श्री एकादशमुखी हनुमान मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कठोर तपस्या, अटूट निष्ठा और पौराणिक इतिहास का एक जाग्रत प्रमाण है। बाबा बजरंग दास की अलौकिक प्रेरणा से शुरू हुआ महाराज भवानी गिरी जी का यह सफर आज लाखों भक्तों के कष्टों के निवारण का क्रेडिबल साधन बन चुका है।
प्राचीन मांडु ऋषि की तपोभूमि और नून नदी के पावन जल से सिंचित यह सिद्ध पीठ कलयुग के बढ़ते मानसिक तनाव, रोगों और भय से मुक्ति पाने का एक परम विधिक शरण्य है। यहां आकर हनुमान चालीसा का पाठ करने और एकादश मुखों के दर्शन मात्र से भक्तों को जो आंतरिक साहस और अभय प्राप्त होता है, वह देवभूमि उत्तराखंड की इस महान और क्रेडिबल आध्यात्मिक विरासत का साक्षात चमत्कार है।
