एक तपस्वी की परिभाषा हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड को 'देवभूमि' कहा जाता है, लेकिन यह भूमि 'कर्मवीरों' की भी है। यहाँ की विषम भौगोलिक परिस्थितियाँ और दुर्गम पहाड़ जहाँ बड़े-बड़ों का हौसला डिगा देते हैं, वहीं कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो इन पहाड़ों से भी ऊँचे इरादे रखते हैं। ग्राम कंडारा के मूल निवासी श्री रमेश कंडारी जी एक ऐसा ही नाम है, जिन्होंने शिक्षा को व्यवसाय नहीं, बल्कि 'साधना' माना है। जनपद रुद्रप्रयाग के शिक्षा जगत में उन्हें 'पितामह' की उपाधि देना मात्र सम्मान नहीं, बल्कि उनके दो दशकों के कठिन परिश्रम का प्रतिबिंब है।
1. यात्रा का आरंभ: बाडब की माटी और संकल्प
वर्ष 2005 में जब श्री रमेश कंडारी जी ने राजकीय प्राथमिक विद्यालय बाडब में सहायक अध्यापक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया, तो उनके सामने चुनौतियाँ पहाड़ जैसी खड़ी थीं। बाडब – एक ऐसा क्षेत्र जहाँ पहुँचने के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ता है। शुरुआती वर्षों में उनके साथ अन्य सहकर्मी भी थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। वर्ष 2009 में विद्यालय में कार्यरत अन्य शिक्षिका के स्थानांतरण के बाद, इस पूरे विद्यालय का भार कंडारी जी के कंधों पर आ गया।
2. एकल संघर्ष: 16 वर्षों का मौन तप
एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी चुनौती तब होती है जब उसे न केवल पढ़ाना हो, बल्कि अकेले ही विद्यालय का प्रबंधन, मिड-डे मील की व्यवस्था, आधिकारिक कागजी कार्रवाई और बच्चों के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करनी हो।
- अकेलेपन का साहस: वर्ष 2009 से लेकर 2026 तक, यानी लगभग 16 वर्षों तक उन्होंने 'एकल शिक्षक' के रूप में इस विद्यालय की मशाल को जलाए रखा।
- प्रशासनिक और मानवीय दायित्व: बीच-बीच में नियुक्तियाँ हुईं, लेकिन दुर्गम परिस्थितियों के कारण शिक्षक टिक नहीं पाए। परंतु कंडारी जी अडिग रहे। उनका मानना था कि "अगर मैं भी हट गया, तो इन बच्चों के भविष्य का क्या होगा?"
3. पगडंडियों की कठिन परीक्षा: धूप, बर्फ और फिसलन
श्री कंडारी जी का विद्यालय तक पहुँचने का मार्ग किसी एडवेंचर से कम नहीं है।
- दुर्गम पथ: जाबरी से लगभग तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई, फिर घनी झाड़ियों और जंगलों के बीच से रास्ता बनाना।
- प्राकृतिक आपदाएं: बाडब से डेढ़ किलोमीटर की वह फिसलन भरी उतराई, जहाँ बारिश के दिनों में पैर टिकना मुश्किल होता है और सर्दियों में बर्फ की ठिठुरन हड्डियों को कंपा देती है।
- अविचलित निष्ठा: टूटी सड़कें और संकरी पगडंडियाँ उनकी राह नहीं रोक पाईं। वे प्रतिदिन विद्यालय ऐसे पहुँचते हैं जैसे कोई पुजारी मंदिर पहुँचता है। उनके लिए कक्षा का ब्लैकबोर्ड ही उनकी वेदी है।
4. संघर्षों से गढ़ी गई पीढ़ियां
शिक्षक केवल वह नहीं जो किताब पढ़ाए, बल्कि वह है जो चरित्र का निर्माण करे। कंडारी जी ने सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों को वह संस्कार और शिक्षा दी, जो आज के कॉन्वेंट स्कूलों में भी दुर्लभ है। उन्होंने विद्यालय को सिर्फ एक इमारत नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक परिवार की तरह सींचा। बच्चों के लिए वे गुरु भी थे, अभिभावक भी और मार्गदर्शक भी।
5. एक नए युग का सूत्रपात: श्री अनुज चौधरी का आगमन
29 जनवरी 2026 की तारीख राजकीय प्राथमिक विद्यालय बाडब के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी। वर्षों के अकेले संघर्ष के बाद, श्री अनुज चौधरी जी ने यहाँ सहायक अध्यापक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया है। यह न केवल कंडारी जी के लिए एक बड़ी राहत है, बल्कि विद्यालय के लिए नई ऊर्जा का संचार भी है। कार्तिकेय की इस पावन भूमि पर अनुज जी का आगमन एक नई शुरुआत का प्रतीक है।
क्यों मिलना चाहिए श्री रमेश कंडारी जी को राष्ट्रीय पुरस्कार?
आज जब शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है, तब श्री रमेश कंडारी जैसे शिक्षक 'निस्वार्थ सेवा' की मशाल जलाए हुए हैं। उनका जीवन निम्नलिखित कारणों से राष्ट्रीय सम्मान का हकदार है:
- निरंतरता: 20 वर्षों का अटूट सेवाकाल।
- धैर्य: 16 वर्षों तक दुर्गम क्षेत्र में एकल शिक्षक के रूप में कार्य।
- कर्तव्यनिष्ठा: कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद शून्य अनुपस्थिति का संकल्प।
- प्रेरणा: आने वाली शिक्षकों की पीढ़ी के लिए वे एक जीवंत आदर्श (Role Model) हैं।
निष्कर्ष: युग का उजियारा
कवि सतपाल जी की पंक्तियाँ श्री कंडारी जी के व्यक्तित्व पर सटीक बैठती हैं:
"स्वार्थ त्याग कर पीढ़ियों का भविष्य जो लिखता है —
वही सच्चा गुरु, धरती पर चलता हुआ उजियारा है।"
श्री रमेश कंडारी जी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं। वे प्रमाण हैं कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो हिमालय की चोटियों के बीच भी ज्ञान का सूरज उगाया जा सकता है। जनपद रुद्रप्रयाग और समस्त उत्तराखंड को अपने इस 'शिक्षा के पितामह' पर गर्व है।
लेखक एवं साभार: मूल विचार एवं कविता: कवि सतपाल प्रस्तुति: [Aapki Media]