रुड़की (हरिद्वार): उत्तराखंड में 'जीरो टॉलरेंस' और विकास के दावों के बीच रुड़की के लाठरदेवा शेख गांव से एक ऐसी शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी तंत्र और सत्ताधारी नेताओं के गठजोड़ को बेनकाब करती है। यहाँ कागजों पर तो करोड़ों की पेयजल योजना "दौड़" रही है, लेकिन धरातल पर ग्रामीणों के गले प्यास से सूखे हैं।
करोड़ों का बजट, जंग खाती पाइपलाइन
ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 2016-17 में पेयजल विभाग ने करीब 1 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से गांव में पानी की टंकी का निर्माण कराया था। आरोप है कि घटिया निर्माण सामग्री के कारण सप्लाई शुरू होते ही पाइपलाइन जगह-जगह से फट गई। आज हालात यह हैं कि पिछले 8-10 सालों से गांव में पानी की एक बूंद नहीं पहुँची है, जबकि सरकारी फाइलों में सप्लाई को सुचारू दिखाया जा रहा है।
भ्रष्टाचार की 'क्रोनोलॉजी': एक नजर में
| बिंदु | जमीनी हकीकत | सरकारी कागजों का दावा |
| पेयजल सप्लाई | पिछले 8-10 वर्षों से ठप। | सप्लाई सुचारू और नियमित। |
| बिजली कनेक्शन | लंबे समय से कटा हुआ है। | संचालित (Operational)। |
| पानी की गुणवत्ता | कीड़े वाला और दूषित पानी। | फरवरी 2026 में सफल 'सैंपलिंग'। |
| पाइपलाइन | पूरी तरह जंग खा चुकी है। | रखरखाव (Maintenance) दुरुस्त। |
भाजपा नेता और विभाग पर गंभीर आरोप
ग्रामीणों ने आज प्रदर्शन करते हुए भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष अनीस गौड़ और पेयजल विभाग के अधिकारियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि:
- गुमराह करने का खेल: भाजपा नेता और अधिकारी मिलकर सरकार को गुमराह कर रहे हैं।
- मिलीभगत: निजी लाभ के लिए करोड़ों की योजना को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया गया।
- बीमारियों का खतरा: लोग घरों में लगे नलों से आने वाले दूषित और कीड़े वाले पानी को पीने को मजबूर हैं, जिससे गांव में महामारी फैलने का डर बना हुआ है।
ग्राउंड जीरो: कागजों पर 'सैंपलिंग', धरातल पर कटी बिजली
हैरानी की बात यह है कि इसी साल फरवरी माह में विभाग ने कागजों पर पानी की 'सैंपलिंग' भी कर डाली। सवाल यह है कि जब टंकी का बिजली कनेक्शन ही कटा हुआ है और पानी घरों तक पहुँच ही नहीं रहा, तो विभाग ने सैंपल कहाँ से लिया? यह सीधे तौर पर एक बड़े घोटाले और फर्जीवाड़े की ओर इशारा करता है।
मुख्यमंत्री धामी से गुहार: "न्याय करो महाराज"
आक्रोशित ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि:
"हम लोग बीमारियों के साये में जी रहे हैं। हमारे बच्चों को कीड़े वाला पानी पीना पड़ रहा है। हम चाहते हैं कि दोषी भाजपा नेता और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो और हमें स्वच्छ जल मिले।"
सिस्टम की विफलता पर सवाल
लाठरदेवा शेख की यह तस्वीर केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि कैसे भ्रष्टाचार की जड़ें सरकारी सिस्टम में गहरी पैठी हुई हैं। क्या प्रदेश की 'जीरो टॉलरेंस' सरकार अपने ही दल के नेता और जिम्मेदार अधिकारियों पर नकेल कसेगी? या फिर कागजों का यह 'झूठा पानी' ऐसे ही बहता रहेगा और ग्रामीण प्यासे मरेंगे?
