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देहरादून (जागरण संवादी)। उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक कला और क्षेत्रीय सिनेमा के भविष्य को लेकर राजधानी देहरादून में एक महत्वपूर्ण संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस विमर्श के दौरान प्रसिद्ध अभिनेत्री, फिल्म निर्माता एवं समाजसेविका डॉ. आरुषि निशंक ने लोक संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि किसी भी समाज की लोक संस्कृति वास्तव में उसके संस्कारों का जीवंत प्रतिबिंब होती है।
आरुषि निशंक ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में उत्तराखंड की अनूठी संस्कृति को एक व्यापक फलक पर परिभाषित और स्थापित किए जाने की महती आवश्यकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध राज्य है, लेकिन कई बार हम स्वयं अपनी इस विरासत की गहराई और महत्व को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाते हैं।
बुनियादी स्तर पर प्रयास और व्यक्तिगत जिम्मेदारी की आवश्यकता
सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण और संवर्धन को लेकर चर्चा करते हुए फिल्म निर्माता आरुषि निशंक ने कहा कि इसके लिए केवल ऊपरी स्तर पर नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बुनियादी धरातल पर ठोस काम करने की जरूरत है। उन्होंने समाज के प्रत्येक नागरिक से इस दिशा में सचेत होने का आह्वान किया।
इस संदर्भ में निम्नलिखित वैचारिक बिंदुओं को मुख्य रूप से सामने रखा गया:
- व्यक्तिगत जिम्मेदारी: सांस्कृतिक चेतना का विकास तभी संभव है, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर अपनी जिम्मेदारी को समझेगा और अपनी भाषा, कला व परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय प्रयास करेगा।
- संसाधनों की प्रचुरता: उत्तराखंड राज्य के पास न तो समृद्ध लोक साहित्य की कोई कमी है और न ही फिल्म निर्माण या कलात्मक गतिविधियों के लिए सुंदर प्राकृतिक लोकेशंस (स्थानों) का कोई अभाव है।
- वैश्विक सिनेमा से प्रेरणा: यदि सही दिशा में योजनाबद्ध प्रयास किए जाएं, तो उत्तराखंड का क्षेत्रीय सिनेमा भी टॉलीवुड (दक्षिण भारतीय सिनेमा), बॉलीवुड और हॉलीवुड से तकनीकी व रचनात्मक प्रेरणा लेकर स्वयं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाम तक पहुंचा सकता है।
- परंपरा और आधुनिकता का समन्वय: सांस्कृतिक विकास का अर्थ पुरानी रूढ़ियों से बंधे रहना नहीं है। वर्तमान समय की मांग है कि हम अपनी गौरवशाली परंपराओं और आधुनिक तकनीकी विकास के बीच एक मजबूत व व्यावहारिक समन्वय (Balance) स्थापित करें।
संस्कृति की व्यापक परिभाषा: केवल गीत-संगीत तक सीमित नहीं है दायरा
संवाद के दौरान संस्कृति को बहुत ही सूक्ष्म और व्यापक रूप में परिभाषित किया गया। आरुषि निशंक ने इस भ्रांति को दूर करने का प्रयास किया कि संस्कृति का मतलब केवल मंचों पर होने वाले गीत, संगीत या नृत्य प्रदर्शन तक ही सीमित है।
उन्होंने तर्क दिया कि गीत, संगीत, नृत्य, कला, साहित्य और सिनेमा जैसे विभिन्न रूप निश्चित ही संस्कृति के अत्यंत महत्वपूर्ण अंग हैं, जो लंबे समय (कालांतर) में किसी भी लोक की समृद्धि और पहचान का मुख्य आधार बनते हैं। लेकिन, इसके साथ ही समाज में एक विरोधाभासी स्थिति भी देखने को मिल रही है। आज के समय में यह एक कड़वा सच है कि हम भौतिक संपत्तियों और मकानों पर तो अपना अधिकार जताने की तीव्र इच्छा रखते हैं, परंतु जब बात अपनी मूल बोली-भाषा, पारंपरिक गीत-संगीत और लोक नृत्यों को अपनाने या उन पर अपना अधिकार जताने की आती है, तो हम पीछे हट जाते हैं।
वास्तव में, संस्कृति केवल मनोरंजन या कला विधाओं का नाम नहीं है, बल्कि वह मानव जीवन जीने के समस्त आयामों और दैनिक आचरण में पूरी तरह से विद्यमान रहती है।
भौगोलिक विविधताओं और आचार-व्यवहार से होता है लोक का जन्म
लेख में इस बात को विशेष रूप से स्पष्ट किया गया है कि किसी भी क्षेत्र की संस्कृति का निर्माण वहां की भौगोलिक परिस्थितियों और मानव समाज के आपसी तालमेल से होता है। उत्तराखंड के संदर्भ में यदि देखा जाए, तो यहाँ की संस्कृति:
- प्राकृतिक संपदा से निर्मित है: यह संस्कृति यहाँ की अविरल बहने वाली नदियों, शांत घाटियों, ऊंचे बर्फबारी वाले पर्वतों, प्राकृतिक झरनों और जंगलों के बीच से गुजरने वाली पगडंडियों से आकार लेती है।
- श्रम और कृषि संस्कृति का हिस्सा है: पहाड़ों के कठिन भूगोल के बीच खेतों और खलिहानों में होने वाले कड़े परिश्रम से लोक धुनों और लोक विधाओं का जन्म होता है।
- मानवीय आचार-व्यवहार का निचोड़ है: इन तमाम भौगोलिक विविधताओं और विषमताओं के बीच अत्यंत सादगी के साथ जीवन यापन करने वाले स्थानीय निवासियों के पारस्परिक आचार-व्यवहार, रीति-रिवाजों, नैतिकता और आपसी भाईचारे से ही वास्तविक लोक संस्कृति का जन्म होता है, जो अंततः हमारी लोक अस्मिता को परिभाषित करती है।
सांस्कृतिक विमर्श और मुख्य तत्वों का विवरण
| क्र.सं. | सांस्कृतिक एवं सिनेमाई मानक (Cultural Metrics) | मुख्य विचार एवं विश्लेषणात्मक विवरण (Key Concepts & Vision) |
|---|---|---|
| 1. | मुख्य वक्ता एवं संदर्भ | डॉ. आरुषि निशंक (अभिनेत्री, फिल्म निर्माता एवं समाजसेवी) |
| 2. | लोक संस्कृति की मूल परिभाषा | मानव समाज के नैतिक संस्कारों का वास्तविक प्रतिबिंब |
| 3. | वर्तमान मुख्य आवश्यकता | उत्तराखंड की विरासत को वैश्विक व व्यापक फलक पर परिभाषित करना |
| 4. | सिनेमाई विकास का लक्ष्य | टॉलीवुड, बॉलीवुड व हॉलीवुड की तर्ज पर स्वयं को स्थापित करना |
| 5. | सफलता का मूल मंत्र | आधुनिकता (Modernity) और परंपरा (Tradition) के बीच कुशल समन्वय |
| 6. | संस्कृति के मुख्य अंग | गीत, संगीत, नृत्य, कला, साहित्य, सिनेमा और बोली-भाषा |
| 7. | भौगोलिक आधार स्रोत | नदियाँ, घाटियाँ, पर्वत, झरने, खेत-खलिहान और जनमानस का आचार-व्यवहार |
